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Wednesday, March 3, 2010

हेल्प टॉक- videos

यह लेक्चर महोदय नासिर महमूद द्वारा हेल्प पुस्कालय में विषय "Learn to treat yourself through Sujok".
नासिर महमूद से आप यहाँ पर संपर्क कर सकते हैं: 9930178879





















Tuesday, February 17, 2009

टॉयफायड



टॉयफायड क्या है ?

टॉयफायड का बुखार, जिसे एंटेरिक फीवर या केवल टॉयफायड भी कहते हैं, सालमोनेला एंटेरिका सेरोवर टायफी नाम बैक्टिरिया से होता है ।


यह कैसे होता है ?

यह विश्वभर में होता है । किसी संक्रमित व्यक्ति के पुरीष से संदूषित आहार या जल से यह इन्फेक्शन फैलता है । यह बैक्टिरिया फिर आँतों की दीवार में छेद कर देते हैं और मैक्रोफेजस द्वारा निगलने के लिए (फैगोसाइट) आक्रमण करते हैं । सालमोनेवा टाईफी अपनी रचना बदल कर इनसे अपना बचाव करते हैं । इस तरह मैक्रोफेजस से छूट मिलने पर पी एम एन पूरक घटक और इम्यून सिस्टम को क्षति पहुँचाने में इन्हें बाधा नहीं होती ।


प्रमुख लक्षण क्या है ?

टॉयफायड बुखार की पहचान 40 डिग्री सेंटिग्रड (104 डिग्री फारनहाईट) जैसे तेज बुखार से होती है । इसक साथ प्रचूर पसीना, गेस्ट्रोइन्टराईटिस और रक्तहीन अतिसार, चपटे ददोरे कम ही होते हैं, गुलाबी दाने निकल सकते हैं । चिर सम्मत टॉयफायड के बुखार की चार अवस्थाएँ होती है । प्रत्येक अस्था एक सप्ताह की होती है । पहले सप्ताह में बुखार धीरे धीरे बढ़ता है और इसके साथ रिलेटिव बैडिकर्डिया, मतली, सिरदर्द और खॉंसी होती है ।

एक चौथाई रोगियों में नाक से रक्त का रिसाव और पेट का दर्द भी हो सकता है । रक्त संचार में श्वेत कण की मात्रा कम (ल्यूकोपीनिया) इसनोफिल और अपेक्षाकृत लिंफोसाइट बढ़े होते हैं । डाइजो टेस्ट पॉजिटिव और सालमोनेला टाईफी और पैराटाईफी के लिए रक्त का कल्चर भी पॉजिटिव होता है । चिर सम्मत वाईडॉल टेस्ट प्रथम सप्ताह में निगेटिव होता है ।

दूसरे सप्ताह रोग लगभग 40 डिग्री सेन्टीग्रेड (104 डिग्री फारेनहाइट) के बुखार से निर्बल पड़ा रहता है और बैडिकार्डिया (स्फिगमोथर्मिक विघटन) चिर सम्मत द्विगुणित नाड़ी गति रहती है । बार बार उन्माद आता है, कभी शांत और कभी उत्तेजित होता है । इस उन्माद अवस्था के कारण टॉयफायड को नर्वस बुखार की उपसंज्ञा दी गयी है ।

एक तिहाई रोगियों में छाती के निचले हिस्से में गुलाबी दाने प्रकट होते हैं । फेफड़ों के मूल में रॉकई सुनाई पड़ता है, पेट फूला रहता है और नीचे दायीं ओर दर्द होता है । यहीं पर गैस की आवाज भी सुनाई पड़ती है ।

इस अवस्था में अतिसार हो सकते हैं । छ से आठ अतिसार प्रतिदिन हो सकते हैं । मल का रंग हरा और लाक्षणिक बदबू होती है । मल की तुलना मटर के सूप से की जाती है । कभी कभी कब्ज भी हो सकती है । लीवर और प्लीहा बढ़ जाते है (हिपैटोस्प्लिनोमिगेली) । इसमें दर्द रहता है और लीवर ट्रांसएमाइनेज बढ़ा रहता है । एंटी O और एंटी H एंटीबॉडिज के साथ वाइडाल पॉजिटिव रहता है । इस अवस्था में भी कभी कभी रक्त का कल्चर पॉजिटिव रह सकता है ।

टॉयफायड के तीसरे सप्ताह में अनेक उपद्रव हो सकते हैं -

* पेयर और पैच की सहायता सघनता के कारण रक्तस्राव होकर आंतों में रक्त का रिसाव हो सकता है । यह बहुत गंभीर होता है किन्तु घातक नहीं हो ।

* दूरस्थ ईलियम में आँतों का छेदन हो सकता है । यह एक गंभीर उपद्रव है और अक्सर घातक होता है । यह अचानक बिन भयप्रद लक्षण के हो जाता है । इसके बाद सेप्टिसीमिया और विस्तरित पेरिटोनाइटिस हो जाती है ।

* एसेपलाइटिस

* मोटास्टेटिक विद्रधि, कोलिसिस्टाइटिस, एंडोकार्डाइटिस और ऑस्टाइटिस

बुखार अभी भी तेज रहता है और 24 घंटों में थोड़ा बहुत फेर बदल होता है । निर्जलीकरण के कारण रोगी बहक जाता है (टॉयफायड का डिलिरियम) तीसरा सप्ताह समाप्त होने पर बुखार धीमा पड़ने लगता है इस डिफरटिसेंस कहते हैं । यहॉं से चौथा और अंतिम सप्ताह शुरू होता है ।


इसका निदान कैसे होता है ?

इसका निदान रक्त, अस्थि मज्जा या पुरीष और वाइडॉल से किया जाता है ।

महामारी में और निर्धन देशों में मलेरिया, संग्रहणी, निमोनिया के निवारण के बाद वाइडॉल टेस्ट और कल्चर रिपोर्ट आने तक प्रायः क्लॉरमफेनिकॉल का प्रयोग किया जाता है ।


इसकी चिकित्सा कैसे होती है ?

अधिकतर बार टॉयफायड घातक नहीं होता । विकसित देशों में एंपीसीलिन, क्लोरमफेनिकॉल, ट्राइमिथोप्रिम सल्फामिथाक्सोजॉल, एमक्सिन और सिप्रोफ्लोक्सिन जैसे एंटीबायोटिक दिये जाते हैं । एंटीबायोटिक द्वारा तुरन्त चिकत्सा किये जाने पर रोग-घातक दर 1% कम हो जाती है । चिकित्सा न करने पर टॉयफायड तीन सप्ताह से एक महीने तक चलते रहता है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा टॉयफायड निवारण के लिये दो प्रकार के टीके का परामर्श दिया जाता है । वे हैं - जीवित, मौखिक टी वाय 21 ए टीका (वाइवोटिफ बर्ना नाम से मिलता है) और टॉयफायड पॉसैकरायड वैक्सीन का इन्जेक्शन (टाईफीन vi सनोफी, टाफेरिक्स ग्लैक्सो) इन दोनों में 50-80% तक सुरक्षा प्रदान होती है । जो पर्यटक टॉयफायड प्रभावित क्षेत्रों में यात्रा करते हैं उन्हें इसकी सलाह दी जाती है ।


उपयोगी वेबसाईट -

national portal of india : citizens : health : typhoid

typhoid fever causes, sypmtoms, treatment and vaccineon .....

who / typhoid fever

रतिरोग : यौनाचार से होने वाले रोग


यह क्या है ?

रतिरोग या वेनेरियल रोग वे रोग है जो किसी के यौन संपर्क, यौनि, मौखिक या गुद संभोग के कारण होते हैं ।

यह कैसे होता है ?

रतिरोग के विभिन रूप हैं

बैक्टिरिया -

* शैंक्रयड (हीमोफिलस ड्यूकार्ड)

* डोनोवेट्रोसिस ( ग्रेनूलोमा इंगावनेल या केलिमेटो बैक्टिरियम ग्रेनूलोमिटिस)

* गोनोरिया (निंसिरिया गोनोरी)

* लिंफोग्रेनूलोमा वेनेरियम (एल.जी.वी.), क्लामाईडिया, ट्रकोमेटिस सिरोटाईप एल1, एल2, एल3

* नॉन-गोनोकॉकस यूरेथ्रटिस (एन.जी.यू.)(यूरोप्लाज्मा यूरेलियम या माइकोप्लाज्मा ट्रांसमिसिबल)

* सिफिलिस (ट्रैपोनिमा पैलिडिम)

फंगल

* टिनिया क्रूरिस जॉकइच (ट्राइकोफायटोन रुब्रम और अन्य) -यौनाचर जनित

* यीस्ट का संक्रमण

वायरल

* एडिनोवायरस, जो मोटापे का कारण समझा जाता है । यौनाचार द्रव (मल अथवा श्वसन द्रव)

* वायरल हिपेटाइटिस

हिपेटाइस बी वायरस (लीवर कैंसर) लार, यौनाचार द्रव

नोट : हिपेटाइटिस ए और ई मल और मुख द्वार से फैलते हैं । हिपेटाइटिस सी (लीवर कैंसर) यौनाचार से दुर्लभ फैलता है । हिपेटाइटिस डी फैलने का कारण अज्ञात है, किन्तु यौनाचार से फैल सकता है ।

* हर्पिस सिंप्लेक्स (हार्पिस सिंप्लेक्स वायरस 1,2), एच एस वी 2, त्वचा या म्यूकोस से बिना फफोलों से भी फैल सकता है ।

* हर्पिस सिंप्लेक्स वायरस 1 अल्जाईमर रोग संबद्ध हो सकता है ।

* एच आई वी / एड्‌स (ह्यूमैन इम्यूनोडिफिशियेंसी वायरस)- यौनाचार द्रव

* ह्यूमैन पौपिलोमा वायरस (एच पी वी - लगभग 30-40 में यौनाचार से फैलता है) बिना वार्ट की उपस्थिति में त्वचा या म्यूकोसा से फैलता है ।

इन एच की स्ट्रैन से गुद-जननेद्रिय, मुख, गला और श्वसन संस्थान के वार्ट हो सकते है ।

इनसे डिसप्लेसिया होकर, योनिग्रीवा का कैंसर, शिश्न का कैंसर, गुदा का कैंसर, सिर या गर्दन का कैंसर, श्वसन का पैपिलोमेटोसिस हो सकता है ।

* म्यूकोसम कॉन्टेजिपोससम (एम सी वी) -नजदीकी संपर्क द्वारा

* मानो न्यूक्लियोसिस (सी एम वी-हर्पिज 5 ई बी वी- हर्पिज 4) ई बी वी लार द्वारा , सी एम वी लार, स्वेद, मूत्र, मल और यौनाचार द्रव द्वारा

* कोपोस्की का सारकोमा 6 यह सारकोमा हर्पिज वायरस से संबद्ध होता है ।

पैरासाईट

* उरूमूल केश की जुएँ, जिसे क्रैब भी कहते हैं । (फिथ्रिमस ज्यूबिस)

* खुजली (सारकोपेटिस स्कैगई)

प्रोटो जोआ

· ट्राइकोमोनिपासिस (ट्राइकोमानास वजैनेलिस)

यौनाचार से आँतों का इन्फेक्शन

कई बैक्टिरिय के इन्फेक्शन (शाइगेल्ला, कैंपेलोबेक्टर या सालमोनेला) वायरल (हिपेटाइटिस ए, एडिनो वायरस) या पैरासाईट (जियारडिया या अमीबा) यौनाचार से संक्रमण हो गुद और मौखिक संक्रमण पैदा करते हैं ।

यौनाचार के खिलौने को बिना साफ किये उपयोग करने अथवा कई सहभागी एक खिलौने का उपयोग करने पर गुद-मुख के कांबीनेशन के रोग होते हैं । प्रोक्टाइटिस के बिना भी ये बैक्टिरिया गुदा में उपस्थित रहते हैं । ये प्राय अतिसार, बुखार, आध्मान, मतली और पेट का दर्द पैदा करते हैं । इससे रतिरोग अवह संस्थान में फैलने का अनुमान लगाया जाता है ।

मुख द्वारा रतिरोग का इन्फेक्शन

साधारण जुकाम, फ्लू, स्ट्रप्टोकोकस ऑरियस, ई कोलाई, एजिनो वायरस, ह्यमैन पैपिलोमा वायरस, मौखिक हर्पिज (1,2 और 4,5,8) , हिपेटाइटिस बी और यीस्ट, कैनडिडा एल्विकैन से मुख द्वारा इन्फेक्शन फैल सकता है ।

इसके मुख्य लक्षण क्या है ।

कारण के आधार पर लक्षण होते हैं । किन्त जननेन्द्रिय में घाव हो सर्व साधारण बात होती है । इसमें रिसावहीन भी हो सकता है, जो किसी स्त्रियों में सामान्यतया होता है ।

उपयोगी वेबसाईट -

sexually transmitted disease_wikipedia, the tree encyclopedia

sexually transmitted disease_information from cdc

national portal of india : citizens : health : sexually .....

national aids. policy

रैबिज


रैबिज क्या है ?

रेबिज को हाइड्रोफोबिया भी कहा जाता है । यह पशुओं से फैलनेवाला वायर जूनोटिक इन्फेक्शन है । इससे इनकैफोलाइटिस जैसा उपद्रव होता है जो कि निश्चित रूप से चिकित्सा न किये जाने पर घातक होता है । इसका प्रमुख कारण किसी पागल कुत्ते का काटना होता है ।


रेबिज कैसे होती है ?

* किसी संक्रमित पशु के काटने या खुले घाव को चाटने से यह इन्फेक्शन होता है । यह इन्फेक्शन पशुओं में लड़ने या काटने से फैलता है । जब ऐसे संक्रमित पशु आदमी के संपर्क में आते हैं तो इसे आदमी में भी फैलाते हैं । आदमी से आदमी में यह इन्फेक्शन नहीं फैलता ।

* एक बार वायरस आदमी के शरीर में प्रवेश करने यह इन्द्रिय संस्थान पर आक्रमण करता है और मेरूदंड से मस्तिष्क तक जाकर एनसेफलाइटिस उत्पन करता है जो कि घातक होती है ।

* इनफेक्शन के फैलने से बचने का उपाय एंटी बॉडीज होती है । जो कि टीका करण या इम्यूनोग्लोबलिन चिकित्सा द्वारा दी जाती है, यह काटने के 24 घंटे भीतर दिया जाना चाहिए । यह इन्फेक्शन को रोक सकता है ।

* कुत्ता काटने पर प्रत्येक को एंटी रैबीज लगाया जाता है । इससे रोग निवारण और कुत्ता संक्रमित हो तो रोग से रक्षा होती है ।


रैबिज के प्रमुख लक्षण क्या हैं ?

* प्रारंभिक लक्षण हैं - बुखार, मतली और सिर दर्द

* धीरे-धीरे इन्फेक्शन इन्द्रिय संस्थान में फैलता है और अनैच्छिक छटके, अनियंत्रित उत्तेजना, सुस्ती और श्वास का पक्षाघात होता है, यहॉं तक कि पानी भी नहीं निगल पा सकता । पानी पीने का प्रयत्न करने पर आचानक ऐंठन आकार श्वास नली में रुद्धता होकर सांस लेने में तकलीफ होने लगती है । इसका रोगी पानी से डरने लगता है । रैबिज के पीड़ित पशु भी पानी से डरते हैं ।

* एक बार यह लक्षण प्रकट होने पर समान्यता इसका कोई इलाज नहीं है और रोगी श्वासावरोध से मर जाता है ।


इसका निदान कैसे होता है?

* इसका निदान लाक्षणिक है । कुत्ते काटने का वृत्तान्त और कुत्ते काटने के निशान देखे जाते हैं ।

* रक्त और लार की परीक्षा कर पर वायरस देखे जाते हैं । किन्तु इसका कोई सारांश नहीं होता ।

* प्रायः मरणोपरान्त मस्तिष्क के नमूने लेने पर इसमें लाक्षणिक नेग्री बॉडिज देखी जाती है, जो कि वायरस के इन्फेक्शन के कारण होती है ।


इसका इलाज कैसे होता है ?

* रैबिज रोकथाम की मुख्यधारा चिकित्सा है कि कुत्ता काटते ही तुरन्त 6 से 8 घंटे या अधिक से अधिक 24 घंटों में एंटी बायोटिक का टीका लगवालेना चाहिए । इस टीको के 3, 5 या 7 इन्जेक्शन दिये जाते हैं । यह रोगी के शरीर पर कुत्ता काटने और कुत्ते में रैबिज होने पर आधारित होता है । यदि कुत्ता काटने के 10 दिन के बाद तक भी स्वस्थ है तो सावधानी के लिए 3 इन्जेक्शन ही पर्याप्त है ।

* यदि कुत्ता असामान्य व्यवहार करता है जैसे कई अन्य लोगों को काटता है, बिना छेड़छाड़ के काटता है, इधर-उधर भागता है, क्रोधित घूरता है और लगातार लार पड़ती है या किसी कोने में निढ़ाल पड़े रहता है, पानी नहीं पाता या 10 दिन में मर जाता है, तो यह समझना चाहिए कि कुत्ता रैबिड है । ऐसी स्थिति में इन्जेक्शन का पूरा कोर्स लेना चाहिए ।

* निश्चित रूप से रैबिड कुत्ते ने काटा हो तो एंटीबॉडिज की अतिरिक्त चिकित्सा और इम्यूनोग्लोबिन लेना चाहिए । इससे रोग का निवारण होने में सहायता मिलती है ।

संदेहास्पद कुत्ता या पशु काटने पर ये सावधानियॉं जरूरी है -

* जितना हो सके घाव को बहते कुनकुने पानी से धोना चाहिए ।

* घाव को खभी भी ढकें नहीं, इसकी पट्टी न करें और टाकें न लागवायें ।

* नजदीकी दवाखाने में या सरकारी अस्पताल में जायें, जहॉं ए.आर.वी. उपलब्ध होती है

* कुत्ता या पशु का निरीक्षण 10 दिन तक करें ।

* यदि कुत्ता पालतू है तो जाने कि उसे टीका दिलाया गया अथवा नहीं और जाने की उसे घुमाने ले जाया जाता है या नहीं । उस क्षेत्र के अन्य घूमंतु पशुओं की जानकारी प्राप्त करें ।


उपयोगी वेबसाईट -

rabies : what we know and what we need to know

प्लेग



प्लेग क्या है ?

यह एक बैक्टिरिया रोग है । यह येरसिनिया पेस्टिस (पूर्व नाम -पेस्टूरेला पेस्टिस) नामक बैक्टिरिया से होता है । ब्यूबोनिक प्लेग इसका प्रचलित प्रकार है ।


यह कैसे होता है ?

चमड़ी के इन्फेक्शन प्रवेश करके लिंफेटिक तक जाता है । जैसा कि प्रायः कीट पतंगों के इन्फेक्शन में होता है, ब्यबोनिक प्लेग लिंफेटिक संस्थान का इन्फेक्शन होता है । प्रायः संक्रमित मक्खी के काटने से होता है । ये मक्खियॉं चूहों जैसे कृन्तको पर पाई जाती है और इनका मेजबान कृन्तक मरने पर दूसरे को शिकार बनाती हैं । एक बार जमने पर बैक्टिरिया लिम्फ नोड पर आक्रमण करके बढ़ने लगते हैं । वरसिनिया पेस्टिस फैगोसाइटोसिस से बचते हैं और फैगोसाईट के अन्दर जननकर उसे समाप्त भी कर देते हैं और जैसे जैसे रोग बढ़ता है लिम्फकोड से रक्त का रिसाव होता है इसका पूरा परिगलन हो जाता है ।

रोग का दूसरा स्वरूप निमोनिक प्लेग होता है, जो फेफड़ों का इन्फेक्शन होता है । इसके परिणाम स्वरूप निमोनिया पनपकर तेजी से फैलता है । आमतौर पर यह कम घातक होता है किन्तु यह खतरनाक और चिकित्सा न करने पर घातक होता है ।


प्लेग के प्रमुख लक्षण क्या हैं ?

ब्यूबोनिक प्लेग का प्रसिद्ध लक्षण लिंफ की ग्रन्थियों की सूजन है - जिसे ब्यूबोज कहते हैं । रोग के निमोनिक प्रकार में सॉंस का भारीपन, छाती में दर्द, दम फूलना आदि लक्षण होते हैं और चिकित्सा न किये जाने पर तीव्र श्वसन फेलयर हो जाता है ।


इसका निदान कैसे होता है?

लिंफ ग्रन्थि और रक्त के नमूनों में बैक्टिरिया देखे जाते हैं । रोग का निदान लाक्षणिक ब्यूबोज के प्रकट होने से हो जाता है ।


इसका इलाज कैसे होता है ?

एंटीबायोटिक का उपयोग ही इसकी चिकित्सा है । ये एंटीबायोटिक हैं - एमानोग्लाइकोसाईड, स्ट्रेप्टोमाइसिन और जेन्टामाइसिन, टेट्रासाइक्लिन, डॉक्सिसाइक्लिन और फ्लूरोक्यूनिलोन समूह के सिप्रोफ्लोक्सिन


उपयोगी वेबसाईट -

bubouiplague_wikipedia, the free encyclopedia

mediline plus medical encyclopedia : plague

मलेरिया



मलेरिया क्या है ?

मलेरिया एक वाहक जनित इन्फेक्शन है, जो एक विशेष जाति के मादा मच्छर के काटने से होता है । ये मच्छर है -एनोफिलिस । ये मच्छर प्लासमोडियम नाम कारक जीवाणु को शरीर में पहुँचाते हैं । भारत जैसे विकासशील देश में प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में मलेरिया की पहचान है ।


मलेरिया कैसे होता है ?

लाल रक्त कण का इन्फेक्शन: कारक घटक प्लास्मोडियम की चार उपजातियॉं होती है । ये हैं -वाइवेक्स, फेल्सियेरम, ऑवेल और मलेरी । इनमें पहली अधिक सामान्य रूप में पाई जाती है । ये प्रोटोजोआ पैरासाइट है । जो मच्छरों द्वारा काटने पर हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं । भीड़-भाड़ वाले इलाकों, गन्दे नालों, अंधेरी जगहों जहॉं मच्छरों का प्रजनन अधिक होता है वहॉं यह रोग अधिक होता है, वहॉं पर यह रोग अधिक होता है । मादा एनोफिलिस मच्छर अंधेरा होने पर काटते है कि झुग्गी झोपड़ी और नीम अंधेरे में यह अधिक होता है ।

यह पैरासाइट हमारे शरीर में और मच्छर में कई स्तर में विकसीत होते हैं । मच्छर के शरीर में विकास होने पर यह स्वस्थ व्यक्तियों में प्रवेश करने में सक्षम हो जाता है और मच्छर काटने पर हमारे शरीर में प्रवेश करता है । मानव शरीर में इसकी दो अवस्थाएँ होती है - एक तो लीवर में और दूसरी लाल रक्त कण में । दोनों अवस्थाओं के परिणाम स्वरूप इन अवयवों की क्षति होकर मलेरिया के लक्षण प्रबल होते हैं ।

एक असक्रिय अवस्था जिसे एक्सो-एरिथ्रोसाइटिक अवस्था कहते हैं, इसमें लाल रक्तकण फूट जाते हैं । जिससे हजारों पैरासाइट रक्त प्रवाह में आ जाते हैं । ये मच्छर काटने पर कैरियर की भूमिका निभाते हैं । जब किसी संक्रमित व्यक्ति को मच्छर काटता है तथा ये सक्रिय पैरासाइट मच्छर में चले जाते हैं और मच्छर में सक्रिय होकर अन्य स्वस्थ व्यक्ति को मच्छर मलेरिया का शिकार बना देता है ।

अक्सर पैरासाइट का लोड अत्याधिक होने पर (विशेषकर प्लास्मोडियम फैल्सिमैरम के कारण)संक्रमित लाल रक्तकण और पैरासाइट के कारण सूक्ष्म रक्त वाहिनियॉं अवरुद्ध होकर फट जाती हैं । ये मस्तिष्क में प्रवेशकर तीव्र बायोकेमिकल असंतुलन पैदा कर देते हैं । इसके कारण जो स्थिति उत्प होती है, उसे सेरिब्रल मलेरिया और रीनल फेलयर (कालापानी का ज्वर) भी कहा जाता है ।

प्रसूता स्त्री में मलेरिया घातक होता है । बच्चों में भी सभी विकासशील देशों में मलेरिया के उपद्रव हैं - तीव्र रक्ताल्पता, यकृत फेलयर और तीव्र रीनल फेलयर ।


मलेरिया के मुख्य लक्षण क्या हैं ?

मलेरिया के लक्षण फ्लू और अन्य ज्वरों से मिलते जुलते रहते हैं । फिर भी तुरन्त निदान कर चिकित्सा की अपेक्षा आवश्यक होती है । इसके प्रमुख लक्षण ये हैं -

* ठंड और कंपन के साथ मध्यम तेज बुखार, जो 2 -4 दिन एकान्तर में आता है । खूब पसीना आना, मलेरिया का सूचक है ।

* तेज सिरदर्द और पेट का दर्द भी सामान्यतया होता है ।

* भूख न लगना और वमन भी हो सकते हैं ।

* लीवर की असामान्यता के कारण रक्त शर्करा कम हो सकती है, जिससे हाइपोग्लाइसिमिया के लक्षण प्रकट होते हैं ।

* चिकित्सा न करने पर तीव्र मलेरिया गहरे भूरे रंग का मूत्र आता है । इसे रीनल फेलयर होकर मूत्र में रक्त उत्सर्जन होने लगता है । इसे हिमोग्लोबिनूरिया कहते हैं ।

* जिनमें झटका, मूर्च्छा या बेहोशी या असामान्य व्यवहार हो उनमें सेरिब्रल मलेरिया का संदेह किया जाता है ।


इसका निदान कैसे होता है ?

* मलेरिया का मुख्य निदान रक्त के स्मिपर में मलेरिया पैरासाइट की उपस्थिति से हो जाता है । इससे प्रकार और पैरासाइट के लोड का भी पता चल जाता है ।

अन्य रक्त परीक्षा में इनकी आवश्यकता पड़ सकती है -

* रक्ताल्पता के हिमोग्लोबियर स्तर

* लीवर की क्षति जानने के लिए लीवर एन्जाइम

* गुर्दे के प्रभाव जानने के लिए रीनल फंक्शन टेस्ट

* लीवर और प्लीहा की वृद्धि जानने के लिए सोनोग्राफी

* हाइपोग्लाइसिमिया होने पर रक्तशर्करा परीक्षा

* प्राथमिक निदान के लिए आजकल मलेरिया एंटीजन भी डिप स्टिक भी उपलब्ध है । इससे एक बूंद रक्त से निदान किया जाता है ।


उसकी चिकित्सा कैसे की जाती है?

मलेरिया की चिकित्सा के लिए विशेष एंटीवायोटिक होते हैं । साधारणतया इसे एंटी मलेरिया कहते हैं । इन्हें विशिष्ट रूप में 3 दिन तक दिया जाता है । प्लास्मोडियम वायवेक्स का निदान होने पर, अथवा मलेरिया की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए 14 दिन तक इसे दिया जाता है । मुख्य एंटी मलेरिया दवाएँ ये हैं -

* प्रमुख एंटी मलेरिया क्लोरोक्विन, क्वीनिन और मेपलोक्विन

* निवारणार्थ - प्राइमक्वीन

* प्रतिरोधात्मक नवीन एटीमलेरिया - अर्टिसुनेट और अर्टेमेथर

सहायक चिकित्सा में शर्करा सन्तुलन के लिए अन्तर्शिरा डेक्सट्रोज, लौह पूरक, लीवर एन्जाइम, रक्त ट्रान्सफ्यूजन आदि दिया जाता है।

रोचक शंका-समाधान

प्रश्न - मैंने सुना है कि सिकल सेल एनिमिया रोगी को मलेरिया नहीं होताहै । क्या यह सच है ?

उत्तर - हॉं, सिंकल सेल एनिमिया रोगी को संक्रमित मच्छर काटने पर नहीं होता । इनमें लक्षण बहुत मन्द होते हैं और विशषतः यह घातक नहीं होता । इसके कई कारण हो सकते है, सबसे प्रमुख है कोशिकाओं में सिकलिंग होती है । यह माना जाता है कि पैरासाइट कोशिकाओं में अम्ल उत्प करते हैं । इस अम्ल के कारण सिकलिंग होकर रक्तकण नष्ट हो जाते हैं साथ ही उसमें उपस्थित पैरासाइट भी समाप्त हो जाते हैं । इसका दूसरा स्पष्टीकरण यह है कि पैरासाइट कम ऑक्सीजन में जीवित नहीं रह सकते । जोकि प्लीहा में भी सामान्य बात है । यही कारण है कि इन रोगियों में मलेरिया से रक्षात्मक उपाय होता है ।