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Tuesday, February 17, 2009

डेंगू

डेंगू क्या है ?

यह एडिस मच्छर के काटने से होने वाला एक तीव्र वायरल इन्फेक्शन है । इससे शरीर की सामान्य क्लॉटिंग (थक्का जमना) की प्रक्रिया अव्यवस्थित हो जाती है । ऐसी अवस्था प्लेटलेट के बहुतायत में नष्ट होने के कारण होती है । इससे कभी कभी घातक रूप में सारे शरीर में रक्तस्राव होने लगता है ।

यह कैसे होता है ?

डेंगू एक विशिष्ट वायरस से होता है । यह वायरस एक प्रकार के एडिस एगेप्टी नामक मच्छर के काटने से हमारे शरीर में प्रवेश करता है । ये मच्छर दिन में काटते हैं ।

ये मच्छर ऐसे स्वच्छ पानी में जहॉं कई दिनों से हलचल न हो उस स्थान पर ब्रीड करते हैं । पानी के पुराने टैंकों में पानी की सतह पर बड़ी संख्या में लार्वा देखे जा सकते हैं । जल संकाय, मछली के खुले टैंक, साफ झील आदि, बरसात और बाढ़ में महामारी के बड़े स्रोत होते हैं ।

किसी संक्रमित आदमी को काटने से मच्छर संक्रमित हो जाते हैं और एक सप्ताह में किसी स्वस्थ आदमी को काट कर इन्फेक्शन फैलाते हैं । एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में इन्फेक्शन नहीं फैलता ।

वायरस शरीर में प्रवेश कर प्लेटलेट पर आक्रमण करता है । प्लेटलेट शरीर में रक्तस्राव रोकने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं । शरीर में प्लेटलेट की संख्या चिंताजनक स्तर तक गिर जाती है । इससे असामान्य रक्तस्राव हो सकता है, जो कि चमड़ी, आमाशय, आंतों और शरीर के अन्य रन्ध्रों से होता है ।

एक छोटी मार लगने पर भी बहुत तेज रक्तस्राव होने लगता है, क्योंकि रक्त क्लॉट (जमने) नहीं हो पाता ।

इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?

डेंगू के प्रारूपिक लक्षण होते हैं । थोड़ा-सा संदेह होने पर पूरी सावधानी बरतना जरूरी होता है । मुख्य लक्षण ये हैं -

* तेज बुखार, दवा उपचार पर भी कम न होना ।

* अत्यन्त तेज शरीर दर्द, विशेषकर जोड़ों और अस्थियों का दर्द ।

* तेज सिर दर्द

* हाथ पैर में चकत्ते होना, विशेषकर दबे भागों में

* मतली और वमन हो सकते हैं

* गंभीर रोगियों में पहले केवल वमन फिर ताजा रक्त या कॉफी के रंग का वमन होता है । मल भी गहरा भूरा या काला होता है ।

इसका निदान कैसे होता है?

संदेहास्पद रोगियों रक्त परीक्षा करने पर प्लेटलेट की कम सख्या पायी जाती है । हिमोग्लोबिन सामान्य हो सकता है । रक्त का ब्लीडिंग और क्लॉटिंग समय लंबा हो सकता है ।

डेंगू का सही निदान रक्त परीक्षा में वायरल एंटीजन की उपस्थिति से होता है ।

डेंगू की चिकित्सा कैसे होती है ?

डेंगू की सहायात्मक चिकित्सा की जाती है । इस वायरस का कोई ईलाज नहीं है । नष्ट हुए प्लेटलेट की पूर्ति के लिए प्लेटलेट का ट्रान्सफ्यूजन, रक्त और बड़ी मात्रा में अन्तशिरा द्वारा द्रव दिया जाता है ।

मलेरिया और अन्य इन्फेक्शन की रोकथाम के लिए अतिरिक्त एंटीबायोटिक दिया जाता है । यह निवारणोपचार होता है और हमेशा इसकी आवश्यकता नहीं होती ।

कुछ वेबसाईट -

dengue symtoms & signs pathology labs mumbai india

dengue fever information/ fever, dengue, patients,

dengue fever fact sheet _cdc division of vector, born diseases....

कैनडिडा

कैनडिडियासिस (कैन्डिड इन्फेक्शन) क्या है ?

साधारणतया हमारे शरीर की म्यूकस झिल्ली में रहने वाला एक प्रकार का यीस्ट है । जब शरीर की सामान्य परिस्थति बदलती है तो यह अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगता है । इससे एक प्रकार का इन्फेक्शन होता है जिसे मोनोलियासिस कहते हैं । इससे बच्चों के कूल्हों में डाइपर रैश, मुँह में छाले, योनि में इन्फेक्शन, शिश्न के चारों ओर, नाखून, गले में, आतों में इन्फेक्शन और हृदय में भी गंभीर इन्फेक्शन हो जाता है ।

यह कैसे होता है ?

यह इन्फेक्शन सामान्यतया चमड़ी में रहने वाले यीस्ट से होता है । सामान्य अवस्था में चमड़ी रहने वाले अन्य बैक्टिरिया, पी.एच., तापमान और नमी इसे बढ़ने नहीं देते । फिर भी इन घटकों के परिवर्तन होने पर जैसा एंटीबायोटिक का अति उपयोग, आधिक आर्द्रता, चमड़ी के दूसरे इन्फेक्शन अधिक रूखापन आदि होने पर इसका संतुलन बिगड़ जाता है और कैडिडा तेजी से बढ़कर इन्फेक्शन उल्लेखित जगहों में कर देता है ।

दुर्लभ रोगी में, जिनमें इम्यूनिटि की समस्या रहती है, जैसे एड्‌स, न्यूमोनिया, कैंसर इनमें यह इन्फेक्शन रक्त में प्रवेश कर जाता है और गला, आँतों और हृदय के वाल्व में फैल कर गंभीर उपद्रव उत्पन कर देता है ।

इसके प्रमुख लक्षण क्या हैं ?

* इससे शिशुओं के कूल्हों के चारो ओर और ऊरूमूल में लालिमा हो जाती है जिसे डाईपर रैश कहते हैं ।

* बच्चों और बड़ों में इम्यूनिटि की कम होने पर साधारणतया मुखगुहा में छाले हो जाते हैं इसे ओरल थ्रश कहते हैं । इससे जीभ और गाल का भीतरी भाग सफेद हो जाता है ।

* योनि प्रभावित होने पर इससे दूधिया बदबूदार रिसाव होता है ।

* पुरुषों में शिश्न प्रभावित होने पर इसके शीर्षस्थ भाग में सूजन व लाल हो जाता है ।

* दुर्लभ रूप में यह रक्त संचार द्वारा फैलता है तब गंभीर गले की खराश, आंतों का इन्फेक्शन होकर पतले दस्त, पेट फूलना और उदरशूल होता है । ऐसे रोगियों में इसोफेजियल कैडिड- यासिस इन्फेक्शन होना आम बात है । गंभीर ल्यूकिमिया, एड्‌स आद में हृदय के वाल्व तक इन्फेक्शन फैल कर कंजेस्टिव कार्डियक फेलयर या एरिथमिया हो सकते है ।

इसका निदान कैसे होता है?

यह चमड़ी और जननांगों का साधारण इन्फेक्शन है जिसे सामान्य परीक्षा द्वारा निदान किया जा सकता है और चिकित्सा की जा सकती है । फिर भी जिनमें निदान में संदेह हो तब ये टेस्ट की जाती है -

* कैडिड इम्यून कॉम्प्लेक्स एसे टेस्ट - यह विशेष रक्त परीक्षा है, जिससे यीस्ट के प्रति कार्यशील एंटीबायोटिक का पता चलता है ।

* पुरीष परीक्षा - आँतों में इन्फेक्शन होने पर मल परीक्षा द्वारा मल में कैन्डिडा का पता चलता है ।

* कैंडिडा कल्चर - मुख गुहा में छाले होने पर रूई द्वारा नमूना निकालकर कल्चर किया जाता है ।

इसकी चिकित्सा क्या है?

इन्फेक्शन के परिमाण पर चिकित्सा निर्भर होती है और अन्य इन्फेक्शन की उपस्थिति और इम्यूनिटि पर भी चिकित्सा निर्भर करती है । इन्फेक्शन की शुरुआत किन कारणों से हो रही है इसकी जॉंच क निवारण करना ही पूरी चिकित्सा हो सकती है ।

इसकी चिकित्सा में अक्सर स्थानीय उपयोग में एंटीफंगल दवा दी जाती है ।

गंभीर इन्फेक्शन में पूरी जॉंच जरूरी होती है । इससे उसके कारणों, सह उपस्थित रोग, आहार और इम्यूनिटि को बढ़ाने के उपाय शामिल होते हैं ।

उपयोगी वेबसाईट

Candidiasis:overview and full index

बर्ड फ्लू

यह क्या है ?

यह संक्रामक रोग पक्षियों में होता है । इसकी शुरुआत पहले जंगली पक्षियों में होती है, फिर यह पालतु पक्षियों में और फिर इन पक्षियों के संपर्क में आने वाले आदमियों मे भी फैल जाता है । पहले यह केवल पक्षियों में होता था किन्तु आजकल पक्षी-पालकों में पोल्ट्री वाले लोगों में भी देखा जाता है । जैसे पश्चिम बंगाल और दक्षिण पूर्व एशियन देशों आदि में होता है ।

यह कैसे होता है ?

इसका कारक जीव एच 5 एन । अत्यन्त संक्रामक होता है । अभी यह स्पष्ट नहीं है कि मनुष्यों में भी इसी वायरस से फ्लू होता है । मनुष्यों में इसके फैलने की सही जानकारी अध्ययनरत है और विवादग्रस्त है । फिर भी यह निश्चित है कि पक्षियों का नजदीक से सम्पर्क इसका कारण है । क्योंकि इन पक्षियों में वायरस होता है और इससे इनफेक्शन फैलता है ।

इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?

आरंभ में इसके लक्षण गले की खराश और श्वास नलिका के इन्फेक्शन से मिलते जुलते रहते हैं ।

* धीरे-धीरे फ्लू के जैसे लक्षण विकसित होते हैं, जैसे बुखार, मतली और प्रायः कंजस्टिवाइटिस होता है ।

* तीव्र रोगियों में, इस इन्फेक्शन से सॉंस की तकलीफ होकर मृत्यु भी हो सकती है ।

इसका निदान कैसे होता है?

इसके लिए रक्त परीक्षा पर्याप्त नहीं होती । कुछ फ्लू के रोगियों में विशेष प्रकार के डिपटेस्ट से इसका निदान किया जाता है ।

इसका ईलाज क्या है ?

फ्लू की चिकित्सा जैसे ही इसकी चिकित्सा की जाती है । किन्तु इसके परिणाम अपेक्षाकृत नहीं होते । मनुष्यों में विभि प्रकार के वायरल इन्फेक्शन के लिए औषधि की खोज जरूरी है ।

कुछ वेबसाईट

somequickfactsaboutbirdflu.sify.com

mediline_birdflu

webindia23special articles_avianflu, birdflu

एथलीट का पैर

एथलीट का पैर क्या है ?

एथलीट का पैर एक फंगल इन्फेक्शन है, जो आर्द्र मौसम में पैर की अंगुलियों के बीच होता है । इसे ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि प्रायः यह खिलाडियों और नमी वाली जगहों पर रहने वालों में अधिक होता है जैसे लॉकर, स्वीमिंग पूल, फौव्वारें आदि ।

यह कैसे होता है ?

यह डर्मेटोफाईट से होता है, जो शरीर के अन्य भागों जैसे - सिर, ऊरूमूल आदि को प्रभावित कर सकता है । अक्सर यह इन्फेक्शन आर्द्रावस्था और नमी से अधिक होता है । जैसे - लम्बे समय तक पैताबे पहनना, अधिक पसीना आना और मधुमेही में अधिक होता है ।यह फंगस प्रायः शरीर के नमी वाले भागों जैसे अँगुलियों के बीच में अधिक होता है फिर भी संक्रमित अंगुलियों से खुजा लेने से यह शरीर में और भी जगह फैल सकता है ।

इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?

* सर्वसाधारण लक्षण अंगुलियों के बीच चिपचिपेपन के साथ खुजली आना ।

* धीरे-धीरे इन्फेक्शन बढ़ने पर फफोले हो जाते हैं और लाल होकर उनकी चमड़ी निकल जाती है और बाद में आने लगती है ।

* साधारण स्वस्थ रोगी में यह थोड़ा या स्थानीय होता है, किन्तु मधुमेही में यह तीव्र हो सकता है ।

इसका निदान कैसे होता है ?

प्रभावित क्षेत्र से डॉक्टर कुरेदता है, जो वेदनाविहीन होता है फिर इसे के ओ एच रसायन के साथ मिलाकर माइक्रोस्कोप से इसमें फंगस को खोजा जाता है । इससे इससे इसका निदान हो जाता है ।

इसका ईलाज कैसे होता है ?

* इन्फेक्शन को उपचार के लिए एंटीफंगल क्रीम या मरहम दिया जाता है ।

* अतिरिक्त उपचार के लिए प्रभावित क्षेत्र को मुदु एंटीसेप्टिक से साफ किया जाता है और अच्छी तरह सुखाया जाता है । एंटीफंगल पाऊडर से भी घाव जल्दी सूखता है और इन्फेक्शन कम होता है ।

* तैराकी को मना, जुराबें न पहनना, खुले मुँह के जूते पहनना या नंगे पैर रखने की सलाह दी जाती है ।

* यह एक संक्रामक रोग है । इसलिए परिवार के अन्य सदस्य जुराबें, शूज, स्लीपर, टॉवेल आपस में उपयोग न करें । इससे इन्फेक्शन फैलता है ।

उपयोगी वेबसाईट

mayoclinic athelets foot articles

medicine net athelets foot articles

medrine plus athelets foot articles

Wednesday, January 21, 2009

बच्चों की बदमिजाजी

बच्चों की बदमिजाजी

बच्चे बदमिजाज होते हैं । यह बदमिजाजी सामान्य रुदन, जमीन पर लोटने से लेकर जोरों से चीखना, बातें मारना, ऊपर-नीचे कूदना-फाँदना और कभी कभी उत्तेजित व्यवहार तक रह सकती है । बच्चों के इस व्यवहार को अपनी स्वायतत्ता बताना या अभिभावकों से आजादी पाना - ऐसा समझा जा सकता है ।

बच्चों में बदमिजाजी कब होती है :-

  • जब बच्चे नीन्द न होने से या भूख से थक जाते हैं ।
  • अचानक नापसन्द बदलाव और वातावरण जैसे तलाक या मानसिक अनिश्चितता ।
  • बच्चे मौखिक अभिव्यक्ति नहीं कर सकते इसलिए अपनी संवेदनाएँ - बदमिजाजी से दर्शाते हैं ।
  • कई बार इस बदमिजाजी से घर के बड़ों का ध्यान आकर्षित न होता है ।
  • बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं वे कुछ आजाद रहना और अपना निर्णय खुद लेना चाहते हैं ।
  • कठिन कामों, जैसे स्कूल में अच्छे अंक न प्राप्त करने अथवा प्रतियोगिता में विफल होने पर, बच्चे निराश होकर बदमिजाजी करने लगते हैं ।
  • कभी उनकी मनचाही चीज जैसे - चॉकलेट, मिठाई न मिलने पर भी बच्चे बदमिजाजी करने लगते हैं ।

इससे कैसे निपटें :-

सबसे महत्वपूर्ण है, बच्चे को उसकी बदमिजाजी की सजा कभी न देवें । सजा के भय से बच्चा अपनी संवेदना प्रकट ही नहीं कर सकता और इसके दुष्पिरणाम हो सकते हैं ।

यदि आपका बच्चा बदमिजाजी कर रहा है तो आप इस पर ध्यान न दें क्योंकि वह आप द्वारा मना करने से विचलित है । आपके द्वारा ध्यान न देने पर बच्चा समझता है कि बदमिजाजी से कोई हल नहीं निकलेगा । कई बच्चे कुछ और करने लगते हैं, इसके परिणाम अच्छे होते हैं ।

आप निराश होने पर भी अपना नियंत्रण न खोयें । क्योंकि आप बच्चों के सताने का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं । कभी सजा न देवें और न ही आपा खोकर चीखें । याद रखें, यदि आप अपना नियंत्रण खोते हैं तो दूसरी ओर आपका बच्चा उसे झेल रहा है । और वह बदमिजाजी में भी इसी व्यवहार को सीख रहा है ।

बच्चे की बदमिजाजी रोकने के लिये कभी भी उसे फुसलायें नहीं । इससे उसमें बदमिजाजी बढेगी और वह समझेगा ऐसा करने से उसे कुछ न कुछ तो मिलेगा ।

बदमिजाजी से छुटकारा :

  • बच्चों को तनावपूर्ण स्थिति से दूर रखें और जहाँ ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है उससे भी दूर रखें ।
  • यदि आप बदमिजाजी की शुरुआत होती देखें तो बच्चे का ध्यान उसकी पसंद की ओर आकर्षित करें ।
  • बच्चों को बारबार नीन्द आने का ध्यान रखें और देखें कि बच्चों को कई अन्य स्वास्थ्य समस्या तो नहीं हैं ।
  • जब कभी बच्चे भूखे हों तो उन्हें तुरन्त पौष्टिक आहार मिलना चाहिये ।
  • बच्चों को उसकी साधारण पसंद का अवसर देवें । जैसे - नाश्ते में उसे सैण्डविच में अण्डा या सब्जी पसंद है या पहनने के लिये दो जोडी कपडे चाहिये जो कि आपको भी मान्य हो । इस प्रकार बच्चे भी स्वतंत्र महसूस करते हैं ।
  • अधिकांश बच्चों की बदमिजाजी 3-4 साल की उम्र तक कम हो जाती है । यदि आपको लगे कि बच्चे भी बदमिजाजी उसके कोई अन्य भावुकता का परिणाम है तो तुरंत किसी डॉक्टर से सलाह लें ।
  • बच्चे की बदमिजाजी का हल ढूंढने में याद रखें आप उसके गुस्से का हल निकालकर रहे हैं ना कि उसकी गलतियाँ निकाल रहे हैं ।

कुछ महत्वपूर्ण युक्तियाँ ये है -

  • न सजा दें, न ईनाम दें ।
  • शान्त रहें, जहां तक हो सके अवहेलना करें । प्रतिक्रिया करने से बच्चा समझेगा बदमिजाजी अच्छा हथियार है ।
  • बच्चे को सुरक्षित और हो सके तो अकेला रखें ।
  • बच्चों को आपके व्यवहार की निन्दा न करने दें । यह तो केवल आपका बच्चा ही इसका पात्र है ।

घर पर :-

  • जब बच्चा घर पर बदमिजाजी करे तो उसे शान्ति से उसके रूम में अथवा उसके बिस्तर पर अकेले छोड़ देवें ।
  • और फिर रूम बन्द कर उसे अकेले तब तक छोड़ देवें जब तक वह चीखना बन्द न कर दे ।
  • यदि बच्चे को अकेले छोड़ना असुरक्षित लगे, बच्चे की बदमिजाजी की पूरी अवहेलना कर देवें, उससे आँख तक न मिलाएँ ।
  • बच्चा शान्त होने पर उससे बात करें और उसके व्यवहार के बारे में उसे समझायें ।

सार्वजनिक जगहों पर :-

  • यदि बच्चा सार्वजनिक स्थल पर बदमिजाजी करे तो उसे किसी एकान्त जगह ले जायें ।
  • सबसे अच्छी जगह आपकी कार है । बच्चे को वहां ले जायें और बैठा दें । आप कार के बाहर खड़े रहें या कार ही में बैठ जायें, किन्तु बदमिजाजी के प्रति प्रतिक्रिया न करें । बदमिजाजी शान्त होने पर बच्चे से बात करें समझायें और अपनी सामान्य क्रिया में लौट आयें ।
  • यदि आप सार्वजनिक स्थल से हट नहीं सकते तो किसी भी तरीके से स्थिति को सम्भालें और बच्चे की बदमिजाजी की अवहेलना करें ।
  • लोगों की बातों निगाहों की ओर ध्यान न देवें ।
  • आप शान्त रहें ।
  • एक बार जगह से हटने पर बच्चे को उसके व्यवहार के बारे में समझायें ।

बच्चे को समझाना :-

  • बच्चा शान्त होने पर तुरंत उसे समझायें ।
  • बच्चे को पूरी घटना समझायें और बतायें की आपको गुस्सा क्यों आया, आपने पुकारा किया आदि । इस तरीके से बच्चा सारा घटनाक्रम समझेगा ।
  • बदमिजाजी की घटनाओं से बचने का प्रयास करें ।
  • बदमिजाजी सामान्य व्यवहार नहीं है, ऐसा बच्चे को समझायें । बच्चे को साफ समझायें कि अच्छे बच्चे ऐसी हरकत नहीं करते इसका बच्चे पर प्रभाव पड़ेगा और वह बदमिजाजी नहीं करेगा ।
  • बच्चे को बतायें कि बदमिजाजी के बदले वह अपनी भावना आपको कैसे प्रकट कर सकता है । ऐसा अपनी भावना प्रकट करने का सही तरीका समझाएँ ।
  • बच्चे को विश्वास दिलायें की उसे जब भी गुस्सा आये या निराश हो या कोई समस्या हो तो वह सीधे आपसे कह सकता है । आखिर आप उसकी मदद के लिये ही तो है ना ।
  • ऐसा करने से बच्चे जल्दी समझ जाते हैं । याद रखें बच्चे बड़ों से जल्दी समझते हैं ।
  • इस प्रकार का व्यवहार आपको बार-बार करना पड़ेगा । बच्चे की बदमिजाजी सुधारने में समय लगता है ।

कुछ महत्वपूर्ण वेबसाईट :-

  • www.kidshealth.org / parent / immotion / behaviour / tantrum.html
  • www.betterhealth.vip.gov.au / BHCV2 / bharticles.nsf / pages.tamper tantrums? open document
  • www.vaisngchildren.net.au / articles / temper tantrum.html

दवा के उपयोग में सावधानियाँ

दवा के उपयोग में सावधानियाँ

सावधानी क्यों बरतें ?

बीमारी और स्वास्थ्य की समस्या से छुटकारा पाने के लिये दवा लेना जरूरी है । मामुली सिर दर्द या बुखार के लिये सीधे दुकान से दवा ली जा सकती है अथवा रोगी की पर्याप्त जाँच के बाद डॉक्टर विशिष्ट निदान कर दवा देता है ।

किसी भी प्रकार से दवा रोग के लक्षणों से आराम तो दिलाती है । कभी सही मात्रा व सही योग में दवा न लेने पर इससे कई विभिन्न समस्याएँ पैदा हो जाती है । इसलिए भले ही आप दवा की दुकान से सीधे खरीद कर अथवा डॉक्टर के परामर्श के बाद दवा का उपयोग करें तो पूरी सावधानी बरतना जरूरी है ।

दवा के बारे में आप क्या विवरण पढ़ते और समझते हैं :-

औषधी का नाम, उसके ब्राण्ड का नाम, मात्रा, उसकी अन्य उपयोगी फीचर जैसे सस्टेन्ड या एक्सटेन्डेड अवधि का दवा ।

दवा का वांछित असर और दवा का असर कैसे होगा इसकी जानकारी जैसे - पैरासिटामाल - बुखार कम करती है न कि इन्फैक्शन और इसका लाक्षणिक प्रभाव दो या तीन बार लेने पर होता है ।

सही तरीके से दवा कितनी बार और किस तरीके से लेना है । जैसे - दूध के साथ (भोजन के पहले) या भोजन के बाद रात में (जैसे निद्राकारक दवा), चबाकर लेना है या निगलना है आदि ।

दवा के अवांछित प्रभाव और उन्हें कैसे कम किया जा सकता है । जैसे - एलर्जी शामक दवा लेने से सुस्ती आती है तो उन्हें रात में अथवा भोजन के बाद लिया जाय ।

दवा के संभावित अन्तर-प्रतिक्रिया जैसे - भोजन, मध्यपान अथवा अन्य दवा के साथ प्रतिक्रिया व इनसे कैसे बचा जाय । जैसे - हैलोपेरिडॉल और मद्यपान या माओ-इनहिबिटार के साथ बी.पी. की प्रतिक्रिया आदि ।

दवा उपयोग की अवधि में बचने की प्रतिक्रियाएँ जैसे एन्टी हिस्टामिन या कोडीन युक्त खाँसी का सीरप वाहन का चालन न करें ।

दवा खरीदने और उपयोग में बरती जाने वाली सावधानियाँ :-

लेबल को ध्यान से पढें और उसकी औषधी को समझें, दवा का नाम पढें (कई औषधि स्पेलिंग और उच्चारण में एक जैसी लगती है) । दवा विकेता से सही मात्रा और अवधि की जानकारी ले लेवें ।

स्वयं से दवा कभी न लें । जैसे, दवा की मात्रा स्वयं ही घटाएँ या बढाएँ नहीं । प्रभाव न करने पर या तकलीफ होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, मधुमेह की दवा कभी न रोकें ।

बिना डॉक्टर की सलाह के सीधी खरीदी दवा के साथ डॉक्टर की लिखी दवा का एक साथ उपयोग न करें । यदि आप किसी प्रकार की घरेलू दवा या आयुर्वेदिक दवा ले रहे हो तो डॉक्टर को इसकी सूचना देवें क्योंकि कभी कभी ऐसी दवाएँ एलोपेथी दवा के साथ गंभीर प्रतिक्रिया कर सकती है । यदि डॉक्टर को इसका पता न लगे तो वह आपकी चिकित्सा भी नहीं कर सकता ।

पक्के तौर पर घर में आपके अलावा किसी अन्य सदस्य को आपकी दवा की जानकारी होनी चाहिये । ताकि गंभीर समस्या होने पर वह डॉक्टर को समझा सके ।

आपको जैसा बताया गया है उसी तरीके से दवा लेवें, गोली को कभी तोड़े, चूरा न करें अथवा किसी सीरप में न घोलें । ऐसा करने से पहले डॉक्टर से सलाह ले लेवें । कभी कभी दवा का या तो असर नहीं होता अथवा अधिक प्रतिक्रिया भी हो सकती है । कभी-कभी दूध में भी घोलने से ऐसा हो सकता है ।

दवा की एक्सपायरी (प्रभावी काल) को सावधानी से देखें । चाहे वह आपके घर में हो अथवा खरीद रहे हों तारीख जरूर देखें । तारीख के बाद ही दवा के उपयोग के अवांछित दुष्परिणाम हो सकते हैं ।

अन्य किसी के लिये लिखि दवा, भले ही उसके लिये अच्छी हो आप उसे लेने का दुस्साहस न करें । आपके शरीर की जरूरत, रोग के लक्षण और दवा की प्रतिक्रिया सबके लिये अलग-अलग होती है । इसलिए डॉक्टर की सलाह से बच कर शार्टकर्ट मारकर अपने जीवन को धोके में न डालें ।

आपके डॉक्टर को आपकी एलर्जी आदि की पूरी जानकारी देवें और स्वास्थ्य समस्याएँ जैसे ब्लड प्रेशर, मधुमेह, एपिलेप्सी, हृदय रोग, गुर्दे का रोग, अस्थमा, गेस्ट्राइटिस आदि की जानकारी और कौनसी दवा आप ले रहे हैं पूरी बात अपने डॉक्टर को बताएँ ।

दवा को अच्छी तरह, सीधी धूप से बचाकर, शुष्क स्थान पर सुरक्षित रखें । तीखी गंध वाली दवा से दूर रखें । जब भी दवा लें तो उसका कवर पढ लेवें । अंधेरे में दवा कभी न लेवें । जैसे भूल जाने पर आधी नीन्द से उठकर कभी दवा न लेवें ।

सामान्यत दवा लेते समय मध्यपान न करें क्योंकि शराब से दवा के अवांछित प्रभाव हो सकते हैं जोकि कभी-कभी अत्यन्त गंभीर होते हैं । याद रखें आप अपने डॉक्टर से जरूर कहें कि आप नियमित शराब पीते हैं या शराबी हैं क्योंकि आपका लीवर शराबग्रस्त होता है और दवा के प्रभाव में अंतर आ सकता है ।

दवा के उपयोग में सावधानियाँ

दवा के उपयोग में सावधानियाँ

सावधानी क्यों बरतें ?

बीमारी और स्वास्थ्य की समस्या से छुटकारा पाने के लिये दवा लेना जरूरी है । मामुली सिर दर्द या बुखार के लिये सीधे दुकान से दवा ली जा सकती है अथवा रोगी की पर्याप्त जाँच के बाद डॉक्टर विशिष्ट निदान कर दवा देता है ।

किसी भी प्रकार से दवा रोग के लक्षणों से आराम तो दिलाती है । कभी सही मात्रा व सही योग में दवा न लेने पर इससे कई विभिन्न समस्याएँ पैदा हो जाती है । इसलिए भले ही आप दवा की दुकान से सीधे खरीद कर अथवा डॉक्टर के परामर्श के बाद दवा का उपयोग करें तो पूरी सावधानी बरतना जरूरी है ।

दवा के बारे में आप क्या विवरण पढ़ते और समझते हैं :-

औषधी का नाम, उसके ब्राण्ड का नाम, मात्रा, उसकी अन्य उपयोगी फीचर जैसे सस्टेन्ड या एक्सटेन्डेड अवधि का दवा ।

दवा का वांछित असर और दवा का असर कैसे होगा इसकी जानकारी जैसे - पैरासिटामाल - बुखार कम करती है न कि इन्फैक्शन और इसका लाक्षणिक प्रभाव दो या तीन बार लेने पर होता है ।

सही तरीके से दवा कितनी बार और किस तरीके से लेना है । जैसे - दूध के साथ (भोजन के पहले) या भोजन के बाद रात में (जैसे निद्राकारक दवा), चबाकर लेना है या निगलना है आदि ।

दवा के अवांछित प्रभाव और उन्हें कैसे कम किया जा सकता है । जैसे - एलर्जी शामक दवा लेने से सुस्ती आती है तो उन्हें रात में अथवा भोजन के बाद लिया जाय ।

दवा के संभावित अन्तर-प्रतिक्रिया जैसे - भोजन, मध्यपान अथवा अन्य दवा के साथ प्रतिक्रिया व इनसे कैसे बचा जाय । जैसे - हैलोपेरिडॉल और मद्यपान या माओ-इनहिबिटार के साथ बी.पी. की प्रतिक्रिया आदि ।

दवा उपयोग की अवधि में बचने की प्रतिक्रियाएँ जैसे एन्टी हिस्टामिन या कोडीन युक्त खाँसी का सीरप वाहन का चालन न करें ।

दवा खरीदने और उपयोग में बरती जाने वाली सावधानियाँ :-

लेबल को ध्यान से पढें और उसकी औषधी को समझें, दवा का नाम पढें (कई औषधि स्पेलिंग और उच्चारण में एक जैसी लगती है) । दवा विकेता से सही मात्रा और अवधि की जानकारी ले लेवें ।

स्वयं से दवा कभी न लें । जैसे, दवा की मात्रा स्वयं ही घटाएँ या बढाएँ नहीं । प्रभाव न करने पर या तकलीफ होने पर बिना डॉक्टर की सलाह के ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, मधुमेह की दवा कभी न रोकें ।

बिना डॉक्टर की सलाह के सीधी खरीदी दवा के साथ डॉक्टर की लिखी दवा का एक साथ उपयोग न करें । यदि आप किसी प्रकार की घरेलू दवा या आयुर्वेदिक दवा ले रहे हो तो डॉक्टर को इसकी सूचना देवें क्योंकि कभी कभी ऐसी दवाएँ एलोपेथी दवा के साथ गंभीर प्रतिक्रिया कर सकती है । यदि डॉक्टर को इसका पता न लगे तो वह आपकी चिकित्सा भी नहीं कर सकता ।

पक्के तौर पर घर में आपके अलावा किसी अन्य सदस्य को आपकी दवा की जानकारी होनी चाहिये । ताकि गंभीर समस्या होने पर वह डॉक्टर को समझा सके ।

आपको जैसा बताया गया है उसी तरीके से दवा लेवें, गोली को कभी तोड़े, चूरा न करें अथवा किसी सीरप में न घोलें । ऐसा करने से पहले डॉक्टर से सलाह ले लेवें । कभी कभी दवा का या तो असर नहीं होता अथवा अधिक प्रतिक्रिया भी हो सकती है । कभी-कभी दूध में भी घोलने से ऐसा हो सकता है ।

दवा की एक्सपायरी (प्रभावी काल) को सावधानी से देखें । चाहे वह आपके घर में हो अथवा खरीद रहे हों तारीख जरूर देखें । तारीख के बाद ही दवा के उपयोग के अवांछित दुष्परिणाम हो सकते हैं ।

अन्य किसी के लिये लिखि दवा, भले ही उसके लिये अच्छी हो आप उसे लेने का दुस्साहस न करें । आपके शरीर की जरूरत, रोग के लक्षण और दवा की प्रतिक्रिया सबके लिये अलग-अलग होती है । इसलिए डॉक्टर की सलाह से बच कर शार्टकर्ट मारकर अपने जीवन को धोके में न डालें ।

आपके डॉक्टर को आपकी एलर्जी आदि की पूरी जानकारी देवें और स्वास्थ्य समस्याएँ जैसे ब्लड प्रेशर, मधुमेह, एपिलेप्सी, हृदय रोग, गुर्दे का रोग, अस्थमा, गेस्ट्राइटिस आदि की जानकारी और कौनसी दवा आप ले रहे हैं पूरी बात अपने डॉक्टर को बताएँ ।

दवा को अच्छी तरह, सीधी धूप से बचाकर, शुष्क स्थान पर सुरक्षित रखें । तीखी गंध वाली दवा से दूर रखें । जब भी दवा लें तो उसका कवर पढ लेवें । अंधेरे में दवा कभी न लेवें । जैसे भूल जाने पर आधी नीन्द से उठकर कभी दवा न लेवें ।

सामान्यत दवा लेते समय मध्यपान न करें क्योंकि शराब से दवा के अवांछित प्रभाव हो सकते हैं जोकि कभी-कभी अत्यन्त गंभीर होते हैं । याद रखें आप अपने डॉक्टर से जरूर कहें कि आप नियमित शराब पीते हैं या शराबी हैं क्योंकि आपका लीवर शराबग्रस्त होता है और दवा के प्रभाव में अंतर आ सकता है ।