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Tuesday, February 17, 2009

लैप्टोस्पाइरोसिस

लैप्टोस्पाइरोसिस क्या है ?

इसे विल्स रोग भी कहलाता है । यह लैप्टोस्पाइरा नामक बैक्टिरिया सो होता है जो एक प्रकार का जूनोटिक (पशुओं द्वारा फैलने वाला) बैक्टिरिया है । यह संक्रमित पशु के मूत्र से फैलती है ।

लैप्टोस्पाइरोसिस कैसे होता है ?

यह संक्रमित पशु के मूत्र या वीर्य से फैलता है, जो कि प्राय जल के स्रोत में जल में मिल जाता है । इस प्रकार इसका प्रवेश हमारे शरीर में संक्रमित जलपान अथवा तवचा द्वारा होता है । यह इन्फेक्शन उन लोगों में साधारणतया होता है, जो पालतू जानवरों को पालते हैं, फर के कारखानों में काम करते है अथवा जल मल निकास काम करते है अथवा बरसात या बाढ़ की महामारी के बाद होता है । चूहों के मूत्र से फैलता, ऐसा माना जाता है ।

इसमें वैरकुलाइटिस होती है और यह कई लक्षणों को उत्प करके विभि अवयवो जैसे लीवर और प्लीहा को खराब कर देती है ।

लैप्टोस्पाइरोसिस के प्रमुख लक्षण क्या हैं ?

* बीमारी की शुरुआत फ्लू, ठंड लगना, अत्यधिक बेचैनी और सिरदर्द से होती है ।

* चमड़ी और आँखों में पीलेपन के साथ पीलिया होता है । पेट का दर्द, अतिसार और वमन भी सामान्य लक्षण होते हैं ।

* चिकित्सा न करने पर मेनिनजाइटिस, हृदयरोग और तीव्र रक्तस्राव भी होता है।

* रोग की अग्रिम अवस्था में उपद्रव होकर गुर्दे और लीवर भी काम करना बंद कर देते हैं ।

इसका निदान कैसे होता है ?

* शरीर में बैक्टिरिया भी पहचान रक्त और मूत्र परीक्षा करते निदान किया जाताहै ।

* रक्त परीक्षा में लीवर के एंजाइम का स्तर बढ़ा होता है । इलेक्टोलाईट गुर्दे के फेलयर को दर्शाते हैं ।

उसकी चिकित्सा कैसे की जाती है?

* चिकित्सा का मुख्य ध्येय का अवयवों की क्षति को रोकना होता है साथ ही सहायात्मक चिकित्सा की जाती है ।

* बैक्टिरिया को समाप्त करने के लिए एंटीबायोटिक दिये जाते हैं । इससे रोग की विशाक्तता कम होती है ।

उपयोगी वेब साईट

how to diagnose leptospirosis

emedicine leptospirosis in human article by judith green mckenzie

wtto / 1997_ leptospirosis in india

कुष्ट रोग

कुष्टरोग (हेन्सन का रोग) क्या है ?

कुष्ट रोग या हेन्सन रोग माइक्रो बैक्टिरियम लेप्री नामक जीवाणु से होने वाले चिरकालीन रोग है । इसमें नसें, म्यूकोसा, हाथ पैर और आँख, जिसमें चमड़ी के लक्षण सबसे अधिक प्रकट होते हैं ।

कुष्ट रोग क्यों होता है ?

यह इन्फेक्शन माइक्रो बैक्टिरियम लेप्री से होता है । यह प्रभावित व्यक्ति के श्वस्न संस्थान में होता है । यह हवा द्वारा फैलता है । जैसा की भ्रम है छूने से यह नहीं फैलता । ये अम्ल रंजित बैक्टिरिया होते हैं । इसके गुण टी बी के बैक्टिरिया से मिलते जुलते होते हैं । इसके गुण टीबी के बैक्टिरिया से मिलते जुलते होते हैं । इसका प्रारूपित प्रकटन माइक्रोस्कोप में वैक्सी आवरण और रंजन से होता है । यह महत्वपूर्ण नैदानिक घटक है । स्वस्थ व्यक्ति के संम्पर्क में बैक्टिरिया आने पर यह नसों पर आक्रमण करता है । जिससे संज्ञा की क्षति हो जाती है । त्वचा में संज्ञानाश होने के कारण त्वचा, आँख और समय पर्यन्त हाथ पैर भी प्रभावित हो जाते हैं ।

चिकित्सा न होने पर, संज्ञाविहीन हाथ पैर होने के कारण विकलांगता आ सकती है और धीरे-धीरे पैर भी बच नहीं पाते । साथ ही चमड़ी के परिवर्तन के साथ गंभीर विकलांगता आ जाती है । कुष्ट रोग की इस तरह की शारीरिक विकलांगता एक सामाजिक कलंक है ।

इसके महत्वपूर्ण लक्षण क्या हैं ?

इसके कुछ महत्व पूर्ण लक्षण ये हैं -

* एक या अनेक सफेद या पीले धब्बों का संवेदनहीन चकतों का सारे शरीर पर पाया जाना ।

* अचानक अनपेक्षित रूप से आँखों की पलकों के बालों का झड़ना एक महत्वपूर्ण लक्षण है ।

* चमड़ी का मोटा होना और असामान्य चमड़ी फोल्ड होना विशेषता चहरे पर यह लेनिन फेसी को प्रकट करता है ।

* माथे, कोहनी, घुटने के पीछे और पौंचे के पास की नसों का मोटा होना और वेदना व सूजन आना ।

* चमड़ी के किनारों के पास ललाई के पैचस होकर वेदना होना ।

* चमड़ी के नीचे छोटी छोटी ठोस गॉंठ होना ।

* नाक की सेप्टम क्षत होने के नाक की विकृति होना सामान्य लक्षण है ।

* सम्यक चिकित्सा न करवाने पर अंगुलियॉं, अंगूठा, एड़ी आदि संवेदनाहीन होने के कारण क्षत-विक्षत हो जाती है । इससे अंगुलियॉं छोटी या झड़ भी जाती हैं ।

इसका निदान कैसे होता है ?

* संदेहास्पद पैच होने पर संवेदना का टेस्ट करवाना चाहिए ।

* रोगी की अतिरिक्त पैच और नर्व के मोटे होने की पूरी डॉक्टरी जॉंच करना चाहिए ।

* यदि संवेदना कम या बिलकुल न हो तो, चमड़ी की स्क्रैप और नाक की म्यूकोसा का स्क्रैप की माइक्रोस्कोप द्वारा बैक्टिरिया जॉंच की जाती है ।

* चमड़ी की स्मियर में बैक्टिरिया होने पर, नर्व के मोटे होकर घाव की उपस्थिति और संवेदना हीनता - सभी निदान की पुष्टि करते हैं और तुरन्त चिकित्सा आरंभ की जानी चाहिए ।

* घावों की गंभीरता और नर्व का दुष्प्रभाव के आधार पर कुष्ट रोग का वर्गीकरण किया जाता है । वे हैं - पॉसी बैसीलरी (कम घाव, कम गंभीर), ट्यूबरक्यलॉयड (नर्व अधिक प्रभावित) और म्यूटी बैसीलरी (गंभीर घाव और अत्याधिक बैक्टिरिया।

कुष्टरोग की चिकित्सा कैसे?

चिकित्सा की मुख्यधारा में तीन औषधियॉं हैं - रिफाम्पीसिन, डैपसोन और क्लोफाजामाईन । इनकी अलग अलग मात्रा और मानव रोग की अवस्था के आधार पर निश्चित की जाती है ।

कुछ महत्वपूर्ण वेबसाइट -

mediline plus medical encylopedia : leprosy

leprosy (hansons disease)

welcome to american laprosy mission

bombay leprosy project

जननेन्द्रिय के वार्ट / एच पी वी

जननेन्द्रिय के वार्ट क्या है ?

जननेन्द्रिय के वार्ट (अथवा कोंडाइलोमा, कोडाइलोमैटा एक्यूमिनेटा या रतिरोग, गुदा के वार्ट या एमोजनाइटल वार्ट भी कहते हैं) एक खराब दिखने वाली वृद्धि है जो किसी प्रकार के अतिसंक्रमित के साथ मैथुन क्रिया का परिणाम होते हैं । यह इन्फेक्शन एक उप प्रकार का ह्यूमैन पैपिलोमा वायरस (एचवीपी) के कारण होता है ।

यह कैसे होता है ?

यह एक उप प्रकार के ह्यूमैन पैपिलोयावायरस से होता है । यह चमड़ी के सीधे संपर्क से होता है । यह संक्रमित व्यक्ति के मुँह, जननांग या गुदा मैथुन से हो सकता है । जननांगो के वार्ट से आसानी से जननांग के एचपीवी संक्रमण का पता चल जाता है । यह अत्यन्त संक्रामक होते हैं और असुरक्षित मैथुन क्रिया द्वारा आसानी से फैलता है ।

एक बार एचपीवी का आक्रमण होने पर कई महीनों से लेकर कई साल तक सुप्तावस्था रहती है । यह लक्षणविहीन सहभागी संक्रमण होता है ।

मैथुन क्रिया के समय जननांगों में त्वचा के सूक्ष्म छिद्रों से और न्यकोसल सतहों से खरोंच होने से ये वायरल कण प्रवेश कर जाते हैं ।

इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?

* जननेन्द्रिय के वार्ट गहरे भूरे रंग के झुंड के रूप में चमड़ी पर बढ़ते हैं । ये अत्यन्त छोटे (जैसे तिलों का समूह हो) अथवा बड़े आकार में जननेन्द्रियों अथवा शिश्न के पास होते हैं ।

* स्त्रियों में यह योनि के बाहर या भीतर अथवा योनिमार्ग के द्वार से गर्भाशय तक या गुदा के आसपास कहीं भी हो सकता हैं ।

* पुरुषों में यह शिश्न के ऊपर अथवा शिश्न, अंडकोष अथवा गुदा के आसपास हो सकते हैं । दुर्लभ अवस्था में जननेन्द्रिय के वार्ट मुखगुहा, गले में हो सकते हैं, जो संक्रमित व्यक्ति से मौखिक यौनाचार करते हैं ।

इसका निदान कैसे होता है ?

प्राकृतिक रूप में फूलों की तरह जननेन्द्रिय के पास फैले होने पर जननेन्द्रिय का हार्पिस समझा जाता है ।

* संदेह होने पर, एक विशेष रसायन प्रभावित क्षेत्र पर लगाया जाता है । इसके बाद प्रभावित क्षेत्र सफेद हो जाता है ।

* स्त्रियों में योनिमार्ग आदि में होने पर आंतरिक परीक्षा की जाती है ।

* संदेहास्पद रोगियों में बायोप्सी कराई जाती है ।

* स्त्रियों में एचपीवी इन्फेक्शन होने पर पैप स्मियर भी करवाया जाता है ।

इसकी परीक्षा कैसे की जाती है ?

वार्ट को कायोथैरेपी, लेजर या इलेक्ट्रोकाटराइजेशन द्वारा निकाल दिया जाता है । ये सभी अलग अलग तकनीक है, जिसमें वार्ट का जलाकर एचपीवी के इन्फेक्शन को इस तरह समाप्त कर दिया जाता है कि इसकी पुनरावृत्ति हो सकें ।

उपयोगी वेबसाईट

genital warts_symtoms, treatment and prevention

डेंगू

डेंगू क्या है ?

यह एडिस मच्छर के काटने से होने वाला एक तीव्र वायरल इन्फेक्शन है । इससे शरीर की सामान्य क्लॉटिंग (थक्का जमना) की प्रक्रिया अव्यवस्थित हो जाती है । ऐसी अवस्था प्लेटलेट के बहुतायत में नष्ट होने के कारण होती है । इससे कभी कभी घातक रूप में सारे शरीर में रक्तस्राव होने लगता है ।

यह कैसे होता है ?

डेंगू एक विशिष्ट वायरस से होता है । यह वायरस एक प्रकार के एडिस एगेप्टी नामक मच्छर के काटने से हमारे शरीर में प्रवेश करता है । ये मच्छर दिन में काटते हैं ।

ये मच्छर ऐसे स्वच्छ पानी में जहॉं कई दिनों से हलचल न हो उस स्थान पर ब्रीड करते हैं । पानी के पुराने टैंकों में पानी की सतह पर बड़ी संख्या में लार्वा देखे जा सकते हैं । जल संकाय, मछली के खुले टैंक, साफ झील आदि, बरसात और बाढ़ में महामारी के बड़े स्रोत होते हैं ।

किसी संक्रमित आदमी को काटने से मच्छर संक्रमित हो जाते हैं और एक सप्ताह में किसी स्वस्थ आदमी को काट कर इन्फेक्शन फैलाते हैं । एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में इन्फेक्शन नहीं फैलता ।

वायरस शरीर में प्रवेश कर प्लेटलेट पर आक्रमण करता है । प्लेटलेट शरीर में रक्तस्राव रोकने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं । शरीर में प्लेटलेट की संख्या चिंताजनक स्तर तक गिर जाती है । इससे असामान्य रक्तस्राव हो सकता है, जो कि चमड़ी, आमाशय, आंतों और शरीर के अन्य रन्ध्रों से होता है ।

एक छोटी मार लगने पर भी बहुत तेज रक्तस्राव होने लगता है, क्योंकि रक्त क्लॉट (जमने) नहीं हो पाता ।

इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?

डेंगू के प्रारूपिक लक्षण होते हैं । थोड़ा-सा संदेह होने पर पूरी सावधानी बरतना जरूरी होता है । मुख्य लक्षण ये हैं -

* तेज बुखार, दवा उपचार पर भी कम न होना ।

* अत्यन्त तेज शरीर दर्द, विशेषकर जोड़ों और अस्थियों का दर्द ।

* तेज सिर दर्द

* हाथ पैर में चकत्ते होना, विशेषकर दबे भागों में

* मतली और वमन हो सकते हैं

* गंभीर रोगियों में पहले केवल वमन फिर ताजा रक्त या कॉफी के रंग का वमन होता है । मल भी गहरा भूरा या काला होता है ।

इसका निदान कैसे होता है?

संदेहास्पद रोगियों रक्त परीक्षा करने पर प्लेटलेट की कम सख्या पायी जाती है । हिमोग्लोबिन सामान्य हो सकता है । रक्त का ब्लीडिंग और क्लॉटिंग समय लंबा हो सकता है ।

डेंगू का सही निदान रक्त परीक्षा में वायरल एंटीजन की उपस्थिति से होता है ।

डेंगू की चिकित्सा कैसे होती है ?

डेंगू की सहायात्मक चिकित्सा की जाती है । इस वायरस का कोई ईलाज नहीं है । नष्ट हुए प्लेटलेट की पूर्ति के लिए प्लेटलेट का ट्रान्सफ्यूजन, रक्त और बड़ी मात्रा में अन्तशिरा द्वारा द्रव दिया जाता है ।

मलेरिया और अन्य इन्फेक्शन की रोकथाम के लिए अतिरिक्त एंटीबायोटिक दिया जाता है । यह निवारणोपचार होता है और हमेशा इसकी आवश्यकता नहीं होती ।

कुछ वेबसाईट -

dengue symtoms & signs pathology labs mumbai india

dengue fever information/ fever, dengue, patients,

dengue fever fact sheet _cdc division of vector, born diseases....

कैनडिडा

कैनडिडियासिस (कैन्डिड इन्फेक्शन) क्या है ?

साधारणतया हमारे शरीर की म्यूकस झिल्ली में रहने वाला एक प्रकार का यीस्ट है । जब शरीर की सामान्य परिस्थति बदलती है तो यह अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगता है । इससे एक प्रकार का इन्फेक्शन होता है जिसे मोनोलियासिस कहते हैं । इससे बच्चों के कूल्हों में डाइपर रैश, मुँह में छाले, योनि में इन्फेक्शन, शिश्न के चारों ओर, नाखून, गले में, आतों में इन्फेक्शन और हृदय में भी गंभीर इन्फेक्शन हो जाता है ।

यह कैसे होता है ?

यह इन्फेक्शन सामान्यतया चमड़ी में रहने वाले यीस्ट से होता है । सामान्य अवस्था में चमड़ी रहने वाले अन्य बैक्टिरिया, पी.एच., तापमान और नमी इसे बढ़ने नहीं देते । फिर भी इन घटकों के परिवर्तन होने पर जैसा एंटीबायोटिक का अति उपयोग, आधिक आर्द्रता, चमड़ी के दूसरे इन्फेक्शन अधिक रूखापन आदि होने पर इसका संतुलन बिगड़ जाता है और कैडिडा तेजी से बढ़कर इन्फेक्शन उल्लेखित जगहों में कर देता है ।

दुर्लभ रोगी में, जिनमें इम्यूनिटि की समस्या रहती है, जैसे एड्‌स, न्यूमोनिया, कैंसर इनमें यह इन्फेक्शन रक्त में प्रवेश कर जाता है और गला, आँतों और हृदय के वाल्व में फैल कर गंभीर उपद्रव उत्पन कर देता है ।

इसके प्रमुख लक्षण क्या हैं ?

* इससे शिशुओं के कूल्हों के चारो ओर और ऊरूमूल में लालिमा हो जाती है जिसे डाईपर रैश कहते हैं ।

* बच्चों और बड़ों में इम्यूनिटि की कम होने पर साधारणतया मुखगुहा में छाले हो जाते हैं इसे ओरल थ्रश कहते हैं । इससे जीभ और गाल का भीतरी भाग सफेद हो जाता है ।

* योनि प्रभावित होने पर इससे दूधिया बदबूदार रिसाव होता है ।

* पुरुषों में शिश्न प्रभावित होने पर इसके शीर्षस्थ भाग में सूजन व लाल हो जाता है ।

* दुर्लभ रूप में यह रक्त संचार द्वारा फैलता है तब गंभीर गले की खराश, आंतों का इन्फेक्शन होकर पतले दस्त, पेट फूलना और उदरशूल होता है । ऐसे रोगियों में इसोफेजियल कैडिड- यासिस इन्फेक्शन होना आम बात है । गंभीर ल्यूकिमिया, एड्‌स आद में हृदय के वाल्व तक इन्फेक्शन फैल कर कंजेस्टिव कार्डियक फेलयर या एरिथमिया हो सकते है ।

इसका निदान कैसे होता है?

यह चमड़ी और जननांगों का साधारण इन्फेक्शन है जिसे सामान्य परीक्षा द्वारा निदान किया जा सकता है और चिकित्सा की जा सकती है । फिर भी जिनमें निदान में संदेह हो तब ये टेस्ट की जाती है -

* कैडिड इम्यून कॉम्प्लेक्स एसे टेस्ट - यह विशेष रक्त परीक्षा है, जिससे यीस्ट के प्रति कार्यशील एंटीबायोटिक का पता चलता है ।

* पुरीष परीक्षा - आँतों में इन्फेक्शन होने पर मल परीक्षा द्वारा मल में कैन्डिडा का पता चलता है ।

* कैंडिडा कल्चर - मुख गुहा में छाले होने पर रूई द्वारा नमूना निकालकर कल्चर किया जाता है ।

इसकी चिकित्सा क्या है?

इन्फेक्शन के परिमाण पर चिकित्सा निर्भर होती है और अन्य इन्फेक्शन की उपस्थिति और इम्यूनिटि पर भी चिकित्सा निर्भर करती है । इन्फेक्शन की शुरुआत किन कारणों से हो रही है इसकी जॉंच क निवारण करना ही पूरी चिकित्सा हो सकती है ।

इसकी चिकित्सा में अक्सर स्थानीय उपयोग में एंटीफंगल दवा दी जाती है ।

गंभीर इन्फेक्शन में पूरी जॉंच जरूरी होती है । इससे उसके कारणों, सह उपस्थित रोग, आहार और इम्यूनिटि को बढ़ाने के उपाय शामिल होते हैं ।

उपयोगी वेबसाईट

Candidiasis:overview and full index

बर्ड फ्लू

यह क्या है ?

यह संक्रामक रोग पक्षियों में होता है । इसकी शुरुआत पहले जंगली पक्षियों में होती है, फिर यह पालतु पक्षियों में और फिर इन पक्षियों के संपर्क में आने वाले आदमियों मे भी फैल जाता है । पहले यह केवल पक्षियों में होता था किन्तु आजकल पक्षी-पालकों में पोल्ट्री वाले लोगों में भी देखा जाता है । जैसे पश्चिम बंगाल और दक्षिण पूर्व एशियन देशों आदि में होता है ।

यह कैसे होता है ?

इसका कारक जीव एच 5 एन । अत्यन्त संक्रामक होता है । अभी यह स्पष्ट नहीं है कि मनुष्यों में भी इसी वायरस से फ्लू होता है । मनुष्यों में इसके फैलने की सही जानकारी अध्ययनरत है और विवादग्रस्त है । फिर भी यह निश्चित है कि पक्षियों का नजदीक से सम्पर्क इसका कारण है । क्योंकि इन पक्षियों में वायरस होता है और इससे इनफेक्शन फैलता है ।

इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?

आरंभ में इसके लक्षण गले की खराश और श्वास नलिका के इन्फेक्शन से मिलते जुलते रहते हैं ।

* धीरे-धीरे फ्लू के जैसे लक्षण विकसित होते हैं, जैसे बुखार, मतली और प्रायः कंजस्टिवाइटिस होता है ।

* तीव्र रोगियों में, इस इन्फेक्शन से सॉंस की तकलीफ होकर मृत्यु भी हो सकती है ।

इसका निदान कैसे होता है?

इसके लिए रक्त परीक्षा पर्याप्त नहीं होती । कुछ फ्लू के रोगियों में विशेष प्रकार के डिपटेस्ट से इसका निदान किया जाता है ।

इसका ईलाज क्या है ?

फ्लू की चिकित्सा जैसे ही इसकी चिकित्सा की जाती है । किन्तु इसके परिणाम अपेक्षाकृत नहीं होते । मनुष्यों में विभि प्रकार के वायरल इन्फेक्शन के लिए औषधि की खोज जरूरी है ।

कुछ वेबसाईट

somequickfactsaboutbirdflu.sify.com

mediline_birdflu

webindia23special articles_avianflu, birdflu

एथलीट का पैर

एथलीट का पैर क्या है ?

एथलीट का पैर एक फंगल इन्फेक्शन है, जो आर्द्र मौसम में पैर की अंगुलियों के बीच होता है । इसे ऐसा इसलिए कहा जाता है, क्योंकि प्रायः यह खिलाडियों और नमी वाली जगहों पर रहने वालों में अधिक होता है जैसे लॉकर, स्वीमिंग पूल, फौव्वारें आदि ।

यह कैसे होता है ?

यह डर्मेटोफाईट से होता है, जो शरीर के अन्य भागों जैसे - सिर, ऊरूमूल आदि को प्रभावित कर सकता है । अक्सर यह इन्फेक्शन आर्द्रावस्था और नमी से अधिक होता है । जैसे - लम्बे समय तक पैताबे पहनना, अधिक पसीना आना और मधुमेही में अधिक होता है ।यह फंगस प्रायः शरीर के नमी वाले भागों जैसे अँगुलियों के बीच में अधिक होता है फिर भी संक्रमित अंगुलियों से खुजा लेने से यह शरीर में और भी जगह फैल सकता है ।

इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?

* सर्वसाधारण लक्षण अंगुलियों के बीच चिपचिपेपन के साथ खुजली आना ।

* धीरे-धीरे इन्फेक्शन बढ़ने पर फफोले हो जाते हैं और लाल होकर उनकी चमड़ी निकल जाती है और बाद में आने लगती है ।

* साधारण स्वस्थ रोगी में यह थोड़ा या स्थानीय होता है, किन्तु मधुमेही में यह तीव्र हो सकता है ।

इसका निदान कैसे होता है ?

प्रभावित क्षेत्र से डॉक्टर कुरेदता है, जो वेदनाविहीन होता है फिर इसे के ओ एच रसायन के साथ मिलाकर माइक्रोस्कोप से इसमें फंगस को खोजा जाता है । इससे इससे इसका निदान हो जाता है ।

इसका ईलाज कैसे होता है ?

* इन्फेक्शन को उपचार के लिए एंटीफंगल क्रीम या मरहम दिया जाता है ।

* अतिरिक्त उपचार के लिए प्रभावित क्षेत्र को मुदु एंटीसेप्टिक से साफ किया जाता है और अच्छी तरह सुखाया जाता है । एंटीफंगल पाऊडर से भी घाव जल्दी सूखता है और इन्फेक्शन कम होता है ।

* तैराकी को मना, जुराबें न पहनना, खुले मुँह के जूते पहनना या नंगे पैर रखने की सलाह दी जाती है ।

* यह एक संक्रामक रोग है । इसलिए परिवार के अन्य सदस्य जुराबें, शूज, स्लीपर, टॉवेल आपस में उपयोग न करें । इससे इन्फेक्शन फैलता है ।

उपयोगी वेबसाईट

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