हेल्प ब्लॉग हेल्प ब्लॉग में आपका स्वागत है -यह एक स्वास्थ्य सूचना संसाधन है जो आपको हमेशा हेल्प पुस्तकालय के स्वास्थ्य संबंधित विषयों और गतिविधियों में अवगत रखेगा इ HELP पुस्तकालय, दुनिया के सबसे बड़े नि: शुल्क स्वास्थ्य शिक्षा पुस्तकालय है हमारा मकसद एक रोगी को सवस्थ रोगी बनाना हैं!
खसरा रोग वायरस से होता है । इसके लक्षण हो सकते हैं - बुखार, खॉंसी, नाक का चलना, आँखे लाल होना और सारे शरीर पर दाने (मैक्यूलोपैपूलर, इरिथ्रोमेटस) आना और बच्चों में घातक एनसिफेलोपैथी का होना ।
यह कैसे होता है ?
यह एक वायरस से होनेवाला रोग है, जिसे पैरामिक्सो वायरस कहते हैं । यह हवा के द्वारा फैलता है । छींक, खॉंसी आदि से स्वस्थ व्यक्ति भी संक्रमित हो जाता है । इस अत्यंत संक्रामक रोग के लक्षण 3-6 दिन बाद दोनों रूप में प्रकट होते हैं ।
इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?
इसका प्रारूपिक लक्षण 3-4 दिन तक तेज बुखार आना होता है । इसके तीन लक्षणों को तीन सी -कॉफ, कॉराईजा (नाक चलना) और कन्जक्टिवाइटिस कहते हैं । मुखगुहा में ऊपरी दॉंतों के पास (तालू) सफेद धब्बे (कॉपलिक के धब्बे) दीखने पर खसरे का निदान हो जाता है । किन्तु ये धब्बे थोड़े समय के लिए होते हैं और एक दिन में ही गायब हो जाते हैं । खसरे का चारित्रिक लक्षण है कई दिन बुखार के बाद सारे शरीर पर लाल दाने होना होता है । यह पहले सिर पर होते हैं । फिर सारे शरीर पर हो जाते हैं । इसमें खुजली भी होती है ।
खसरे का निदान कैसे होता है?
खसरे का निदान बुखार, रैश और कॉपलिक के धब्बों पर आधारित होता है । संदेह होने पर वायरस या इम्यूनोलोजिकल टेस्ट करवाते हैं ।
खसरे की चिकित्सा कैसे की जाती है ?
खसरे की कोई विशिष्ट चिकित्सा नहीं है । कई रोगियों में सहायात्मक चिकित्सा की जरूरत पड़ती है ।
मलेरिया एक वाहक जनित इन्फेक्शन है, जो एक विशेष जाति के मादा मच्छर के काटने से होता है । ये मच्छर है -एनोफिलिस । ये मच्छर प्लासमोडियम नाम कारक जीवाणु को शरीर में पहुँचाते हैं । भारत जैसे विकासशील देश में प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में मलेरिया की पहचान है ।
मलेरिया कैसे होता है ?
लाल रक्त कण का इन्फेक्शन:कारक घटक प्लास्मोडियम की चार उपजातियॉं होती है । ये हैं -वाइवेक्स, फेल्सियेरम, ऑवेल और मलेरी । इनमें पहली अधिक सामान्य रूप में पाई जाती है । ये प्रोटोजोआ पैरासाइट है । जो मच्छरों द्वारा काटने पर हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं । भीड़-भाड़ वाले इलाकों, गन्दे नालों, अंधेरी जगहों जहॉं मच्छरों का प्रजनन अधिक होता है वहॉं यह रोग अधिक होता है, वहॉं पर यह रोग अधिक होता है । मादा एनोफिलिस मच्छर अंधेरा होने पर काटते है कि झुग्गी झोपड़ी और नीम अंधेरे में यह अधिक होता है ।
यह पैरासाइट हमारे शरीर में और मच्छर में कई स्तर में विकसीत होते हैं । मच्छर के शरीर में विकास होने पर यह स्वस्थ व्यक्तियों में प्रवेश करने में सक्षम हो जाता है और मच्छर काटने पर हमारे शरीर में प्रवेश करता है । मानव शरीर में इसकी दो अवस्थाएँ होती है - एक तो लीवर में और दूसरी लाल रक्त कण में । दोनों अवस्थाओं के परिणाम स्वरूप इन अवयवों की क्षति होकर मलेरिया के लक्षण प्रबल होते हैं ।
एक असक्रिय अवस्था जिसे एक्सो-एरिथ्रोसाइटिक अवस्था कहते हैं, इसमें लाल रक्तकण फूट जाते हैं । जिससे हजारों पैरासाइट रक्त प्रवाह में आ जाते हैं । ये मच्छर काटने पर कैरियर की भूमिका निभाते हैं । जब किसी संक्रमित व्यक्ति को मच्छर काटता है तथा ये सक्रिय पैरासाइट मच्छर में चले जाते हैं और मच्छर में सक्रिय होकर अन्य स्वस्थ व्यक्ति को मच्छर मलेरिया का शिकार बना देता है ।
अक्सर पैरासाइट का लोड अत्याधिक होने पर (विशेषकर प्लास्मोडियम फैल्सिमैरम के कारण)संक्रमित लाल रक्तकण और पैरासाइट के कारण सूक्ष्म रक्त वाहिनियॉं अवरुद्ध होकर फट जाती हैं । ये मस्तिष्क में प्रवेशकर तीव्र बायोकेमिकल असंतुलन पैदा कर देते हैं । इसके कारण जो स्थिति उत्प होती है, उसे सेरिब्रल मलेरिया और रीनल फेलयर (कालापानी का ज्वर) भी कहा जाता है ।
प्रसूता स्त्री में मलेरिया घातक होता है । बच्चों में भी सभी विकासशील देशों में मलेरिया के उपद्रव हैं - तीव्र रक्ताल्पता, यकृत फेलयर और तीव्र रीनल फेलयर ।
मलेरिया के मुख्य लक्षण क्या हैं ?
मलेरियाकेलक्षणफ्लू और अन्य ज्वरों से मिलते जुलते रहते हैं । फिर भी तुरन्त निदान कर चिकित्सा की अपेक्षा आवश्यक होती है । इसके प्रमुख लक्षण ये हैं -
*ठंड और कंपन के साथ मध्यम तेज बुखार, जो 2 -4 दिन एकान्तर में आता है । खूब पसीना आना, मलेरिया का सूचक है ।
*तेज सिरदर्द और पेटका दर्द भी सामान्यतया होता है ।
*भूख न लगना और वमन भी हो सकते हैं ।
*लीवर की असामान्यता के कारण रक्त शर्करा कम हो सकती है, जिससे हाइपोग्लाइसिमिया के लक्षण प्रकट होते हैं ।
*चिकित्सा न करने पर तीव्र मलेरिया गहरे भूरे रंग का मूत्र आता है । इसे रीनल फेलयर होकर मूत्र में रक्त उत्सर्जन होने लगता है । इसे हिमोग्लोबिनूरिया कहते हैं ।
*जिनमें झटका, मूर्च्छा या बेहोशी या असामान्य व्यवहार हो उनमें सेरिब्रल मलेरिया का संदेह किया जाता है ।
इसका निदान कैसे होता है ?
*मलेरिया का मुख्य निदान रक्त के स्मिपर में मलेरिया पैरासाइट की उपस्थिति से हो जाता है । इससे प्रकार और पैरासाइट के लोड का भी पता चल जाता है ।
अन्य रक्त परीक्षा में इनकी आवश्यकता पड़ सकती है -
*रक्ताल्पता के हिमोग्लोबियर स्तर
*लीवर की क्षति जानने के लिए लीवर एन्जाइम
*गुर्दे के प्रभाव जानने के लिए रीनल फंक्शन टेस्ट
*लीवर और प्लीहा की वृद्धि जानने के लिए सोनोग्राफी
*हाइपोग्लाइसिमिया होने पर रक्तशर्करा परीक्षा
*प्राथमिक निदान के लिए आजकल मलेरिया एंटीजन भी डिपस्टिक भी उपलब्ध है । इससे एक बूंद रक्त से निदान किया जाता है ।
उसकी चिकित्सा कैसे की जाती है?
मलेरिया की चिकित्सा के लिए विशेष एंटीवायोटिक होते हैं । साधारणतया इसे एंटी मलेरिया कहते हैं । इन्हें विशिष्ट रूप में 3 दिन तक दिया जाता है । प्लास्मोडियम वायवेक्स का निदान होने पर, अथवा मलेरिया की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए 14 दिन तक इसे दिया जाता है । मुख्य एंटी मलेरिया दवाएँ ये हैं -
*प्रमुख एंटी मलेरिया क्लोरोक्विन, क्वीनिन और मेपलोक्विन
*निवारणार्थ - प्राइमक्वीन
*प्रतिरोधात्मक नवीन एटीमलेरिया - अर्टिसुनेट और अर्टेमेथर
सहायक चिकित्सा में शर्करा सन्तुलन के लिए अन्तर्शिरा डेक्सट्रोज, लौह पूरक, लीवर एन्जाइम, रक्त ट्रान्सफ्यूजन आदि दिया जाता है।
रोचक शंका-समाधान
प्रश्न - मैंने सुना है कि सिकल सेल एनिमिया रोगी को मलेरिया नहीं होताहै । क्या यह सच है ?
उत्तर - हॉं, सिंकल सेल एनिमिया रोगी को संक्रमित मच्छर काटने पर नहीं होता । इनमें लक्षण बहुत मन्द होते हैं और विशषतःयह घातक नहीं होता । इसके कई कारण हो सकते है, सबसे प्रमुख है कोशिकाओं में सिकलिंग होती है । यह माना जाता है कि पैरासाइट कोशिकाओं में अम्ल उत्प करते हैं । इस अम्ल के कारण सिकलिंग होकर रक्तकण नष्ट हो जाते हैं साथ ही उसमें उपस्थित पैरासाइट भी समाप्त हो जाते हैं । इसका दूसरा स्पष्टीकरण यह है कि पैरासाइट कम ऑक्सीजन में जीवित नहीं रह सकते । जोकि प्लीहामें भी सामान्य बात है । यही कारण है कि इन रोगियों में मलेरिया से रक्षात्मक उपाय होता है ।
इसे विल्स रोग भी कहलाता है । यह लैप्टोस्पाइरा नामक बैक्टिरिया सो होता है जो एक प्रकार का जूनोटिक (पशुओं द्वारा फैलने वाला) बैक्टिरिया है । यह संक्रमित पशु के मूत्र से फैलती है ।
लैप्टोस्पाइरोसिस कैसे होता है ?
यह संक्रमित पशु के मूत्र या वीर्य से फैलता है, जो कि प्राय जल के स्रोत में जल में मिल जाता है । इस प्रकार इसका प्रवेश हमारे शरीर में संक्रमित जलपान अथवा तवचा द्वारा होता है । यह इन्फेक्शन उन लोगों में साधारणतया होता है, जो पालतू जानवरों को पालते हैं, फर के कारखानों में काम करते है अथवा जल मल निकास काम करते है अथवा बरसात या बाढ़ की महामारी के बाद होता है । चूहों के मूत्र से फैलता, ऐसा माना जाता है ।
इसमें वैरकुलाइटिस होती है और यह कई लक्षणों को उत्प करके विभि अवयवो जैसे लीवर और प्लीहा को खराब कर देती है ।
लैप्टोस्पाइरोसिस के प्रमुख लक्षण क्या हैं ?
*बीमारी की शुरुआत फ्लू, ठंड लगना, अत्यधिक बेचैनी और सिरदर्द से होती है ।
*चमड़ी और आँखों में पीलेपन के साथ पीलिया होता है । पेट का दर्द, अतिसार और वमन भी सामान्य लक्षण होते हैं ।
*चिकित्सा न करने पर मेनिनजाइटिस, हृदयरोग और तीव्र रक्तस्राव भी होता है।
*रोग की अग्रिम अवस्था में उपद्रव होकर गुर्दे और लीवर भी काम करना बंद कर देते हैं ।
इसका निदान कैसे होता है ?
*शरीर में बैक्टिरिया भी पहचान रक्त और मूत्र परीक्षा करते निदान किया जाताहै ।
*रक्त परीक्षा में लीवर के एंजाइम का स्तर बढ़ा होता है । इलेक्टोलाईट गुर्दे के फेलयर को दर्शाते हैं ।
उसकी चिकित्सा कैसे की जाती है?
*चिकित्सा का मुख्य ध्येय का अवयवों की क्षति को रोकना होता है साथ ही सहायात्मक चिकित्सा की जाती है ।
*बैक्टिरिया को समाप्त करने के लिए एंटीबायोटिक दिये जाते हैं । इससे रोग की विशाक्तता कम होती है ।
उपयोगी वेब साईट
how to diagnose leptospirosis
emedicine leptospirosis in human article by judith green mckenzie
कुष्ट रोग या हेन्सन रोग माइक्रो बैक्टिरियम लेप्री नामक जीवाणु से होने वाले चिरकालीन रोग है । इसमें नसें, म्यूकोसा, हाथ पैर और आँख, जिसमें चमड़ी के लक्षण सबसे अधिक प्रकट होते हैं ।
कुष्ट रोग क्यों होता है ?
यह इन्फेक्शन माइक्रो बैक्टिरियम लेप्री से होता है । यह प्रभावित व्यक्ति के श्वस्न संस्थान में होता है । यह हवा द्वारा फैलता है । जैसा की भ्रम है छूने से यह नहीं फैलता । ये अम्ल रंजित बैक्टिरिया होते हैं । इसके गुण टी बी के बैक्टिरिया से मिलते जुलते होते हैं । इसके गुण टीबी के बैक्टिरिया से मिलते जुलते होते हैं । इसका प्रारूपित प्रकटन माइक्रोस्कोप में वैक्सी आवरण और रंजन से होता है । यह महत्वपूर्ण नैदानिक घटक है । स्वस्थ व्यक्ति के संम्पर्क में बैक्टिरिया आने पर यह नसों पर आक्रमण करता है । जिससे संज्ञा की क्षति हो जाती है । त्वचा में संज्ञानाश होने के कारण त्वचा, आँख और समय पर्यन्त हाथ पैर भी प्रभावित हो जाते हैं ।
चिकित्सा न होने पर, संज्ञाविहीन हाथ पैर होने के कारण विकलांगता आ सकती है और धीरे-धीरे पैर भी बच नहीं पाते । साथ ही चमड़ी के परिवर्तन के साथ गंभीर विकलांगता आ जाती है । कुष्ट रोग की इस तरह की शारीरिक विकलांगता एक सामाजिक कलंक है ।
इसके महत्वपूर्ण लक्षण क्या हैं ?
इसके कुछ महत्व पूर्ण लक्षण ये हैं -
*एक या अनेक सफेद या पीले धब्बों का संवेदनहीन चकतों का सारे शरीर पर पाया जाना ।
*अचानक अनपेक्षित रूप से आँखों की पलकों के बालों का झड़ना एक महत्वपूर्ण लक्षण है ।
*चमड़ी का मोटा होना और असामान्य चमड़ी फोल्ड होना विशेषता चहरे पर यह लेनिन फेसी को प्रकट करता है ।
*माथे, कोहनी, घुटने के पीछे और पौंचे के पास की नसों का मोटा होना और वेदना व सूजन आना ।
*चमड़ी के किनारों के पास ललाई के पैचस होकर वेदना होना ।
*चमड़ी के नीचे छोटी छोटी ठोस गॉंठ होना ।
*नाक की सेप्टम क्षत होने के नाक की विकृति होना सामान्य लक्षण है ।
*सम्यक चिकित्सा न करवाने पर अंगुलियॉं, अंगूठा, एड़ी आदि संवेदनाहीन होने के कारण क्षत-विक्षत हो जाती है । इससे अंगुलियॉं छोटी या झड़ भी जाती हैं ।
इसका निदान कैसे होता है ?
*संदेहास्पद पैच होने पर संवेदना का टेस्ट करवाना चाहिए ।
*रोगी की अतिरिक्त पैच और नर्व के मोटे होने की पूरी डॉक्टरी जॉंच करना चाहिए ।
*यदि संवेदना कम या बिलकुल न हो तो, चमड़ी की स्क्रैप और नाक की म्यूकोसा का स्क्रैप की माइक्रोस्कोप द्वारा बैक्टिरिया जॉंच की जाती है ।
*चमड़ी की स्मियर में बैक्टिरिया होने पर, नर्व के मोटे होकर घाव की उपस्थिति और संवेदना हीनता - सभी निदान की पुष्टि करते हैं और तुरन्त चिकित्सा आरंभ की जानी चाहिए ।
*घावों की गंभीरता और नर्व का दुष्प्रभाव के आधार पर कुष्ट रोग का वर्गीकरण किया जाता है । वे हैं - पॉसी बैसीलरी (कम घाव, कम गंभीर), ट्यूबरक्यलॉयड (नर्व अधिक प्रभावित) और म्यूटी बैसीलरी (गंभीर घाव और अत्याधिक बैक्टिरिया।
कुष्टरोग की चिकित्सा कैसे?
चिकित्सा की मुख्यधारा में तीन औषधियॉं हैं - रिफाम्पीसिन, डैपसोन और क्लोफाजामाईन । इनकी अलग अलग मात्रा और मानव रोग की अवस्था के आधार पर निश्चित की जाती है ।
जननेन्द्रिय के वार्ट (अथवा कोंडाइलोमा, कोडाइलोमैटा एक्यूमिनेटा या रतिरोग, गुदा के वार्ट या एमोजनाइटल वार्ट भी कहते हैं) एक खराब दिखने वाली वृद्धि है जो किसी प्रकार के अतिसंक्रमित के साथ मैथुन क्रिया का परिणाम होते हैं । यह इन्फेक्शन एक उप प्रकार का ह्यूमैन पैपिलोमा वायरस (एचवीपी) के कारण होता है ।
यह कैसे होता है ?
यह एक उप प्रकार के ह्यूमैन पैपिलोयावायरस से होता है । यह चमड़ी के सीधे संपर्क से होता है । यह संक्रमित व्यक्ति के मुँह, जननांग या गुदा मैथुन से हो सकता है । जननांगो के वार्ट से आसानी से जननांग के एचपीवी संक्रमण का पता चल जाता है । यह अत्यन्त संक्रामक होते हैं और असुरक्षित मैथुन क्रिया द्वारा आसानी से फैलता है ।
एक बार एचपीवी का आक्रमण होने पर कई महीनों से लेकर कई साल तक सुप्तावस्था रहतीहै । यह लक्षणविहीन सहभागी संक्रमण होता है ।
मैथुनक्रिया के समय जननांगों में त्वचा के सूक्ष्म छिद्रों से और न्यकोसल सतहों से खरोंच होने से ये वायरल कण प्रवेश कर जाते हैं ।
इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?
*जननेन्द्रिय के वार्ट गहरे भूरे रंग के झुंड के रूप में चमड़ी पर बढ़ते हैं । ये अत्यन्त छोटे (जैसे तिलों का समूह हो) अथवा बड़े आकार में जननेन्द्रियों अथवा शिश्न के पास होते हैं ।
*स्त्रियों में यह योनि के बाहर या भीतर अथवा योनिमार्ग के द्वार से गर्भाशय तक या गुदा के आसपास कहीं भी हो सकता हैं ।
*पुरुषों में यह शिश्न के ऊपर अथवा शिश्न, अंडकोष अथवा गुदा के आसपास हो सकते हैं । दुर्लभ अवस्था में जननेन्द्रिय के वार्ट मुखगुहा, गले में हो सकते हैं, जो संक्रमित व्यक्ति से मौखिक यौनाचार करते हैं ।
इसका निदान कैसे होता है ?
प्राकृतिक रूप में फूलों की तरह जननेन्द्रिय के पास फैले होने पर जननेन्द्रिय का हार्पिस समझा जाता है ।
*संदेह होने पर, एक विशेष रसायन प्रभावित क्षेत्र पर लगाया जाता है । इसके बाद प्रभावित क्षेत्र सफेद हो जाता है ।
*स्त्रियों में योनिमार्ग आदि में होने पर आंतरिक परीक्षा की जाती है ।
*संदेहास्पद रोगियों में बायोप्सी कराई जाती है ।
*स्त्रियों में एचपीवी इन्फेक्शन होने पर पैप स्मियर भी करवाया जाता है ।
इसकी परीक्षा कैसे की जाती है ?
वार्ट को कायोथैरेपी, लेजर या इलेक्ट्रोकाटराइजेशन द्वारा निकाल दिया जाता है । ये सभी अलग अलग तकनीक है, जिसमें वार्ट का जलाकर एचपीवी के इन्फेक्शन को इस तरह समाप्त कर दिया जाता है कि इसकी पुनरावृत्ति हो सकें ।
यह एडिस मच्छर के काटने से होने वाला एक तीव्र वायरल इन्फेक्शन है । इससे शरीर की सामान्य क्लॉटिंग (थक्का जमना) की प्रक्रिया अव्यवस्थित हो जाती है । ऐसी अवस्था प्लेटलेट के बहुतायत में नष्ट होने के कारण होती है । इससे कभी कभी घातक रूप में सारे शरीर में रक्तस्राव होने लगता है ।
यह कैसे होता है ?
डेंगूएक विशिष्ट वायरस से होता है । यह वायरस एक प्रकार के एडिस एगेप्टी नामक मच्छर के काटने से हमारे शरीर में प्रवेश करता है । ये मच्छर दिन में काटते हैं ।
ये मच्छर ऐसे स्वच्छ पानी में जहॉं कई दिनों से हलचल न हो उस स्थान पर ब्रीड करते हैं । पानी के पुराने टैंकों में पानी की सतह पर बड़ीसंख्या में लार्वादेखेजासकते हैं । जलसंकाय,मछली केखुले टैंक, साफझील आदि, बरसात और बाढ़ में महामारी के बड़े स्रोत होते हैं ।
किसी संक्रमित आदमी को काटने से मच्छर संक्रमित हो जाते हैं और एक सप्ताह में किसी स्वस्थ आदमी को काट कर इन्फेक्शन फैलाते हैं । एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में इन्फेक्शन नहीं फैलता ।
वायरस शरीर में प्रवेश कर प्लेटलेट पर आक्रमण करता है । प्लेटलेट शरीर में रक्तस्राव रोकने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं । शरीर में प्लेटलेट की संख्या चिंताजनक स्तर तक गिर जाती है । इससे असामान्य रक्तस्राव हो सकता है, जो कि चमड़ी, आमाशय, आंतों और शरीर के अन्य रन्ध्रों से होता है ।
एक छोटी मार लगने पर भी बहुत तेज रक्तस्राव होने लगता है, क्योंकि रक्त क्लॉट (जमने) नहीं हो पाता ।
इसके मुख्य लक्षण क्या हैं ?
डेंगू के प्रारूपिक लक्षण होते हैं । थोड़ा-सा संदेह होने पर पूरी सावधानी बरतना जरूरी होता है । मुख्य लक्षण ये हैं -
*तेज बुखार, दवा उपचार पर भी कम न होना ।
*अत्यन्त तेज शरीर दर्द, विशेषकर जोड़ों और अस्थियों का दर्द ।
*तेज सिर दर्द
*हाथ पैर में चकत्ते होना, विशेषकर दबे भागों में
*मतली और वमन हो सकते हैं
*गंभीर रोगियों में पहले केवल वमन फिर ताजा रक्त या कॉफी के रंग का वमन होता है । मल भी गहरा भूरा या काला होता है ।
इसका निदान कैसे होता है?
संदेहास्पद रोगियों रक्त परीक्षा करने पर प्लेटलेट की कम सख्या पायी जाती है । हिमोग्लोबिन सामान्य हो सकता है । रक्त का ब्लीडिंग और क्लॉटिंग समय लंबा हो सकता है ।
डेंगू का सही निदान रक्त परीक्षा में वायरल एंटीजन की उपस्थिति से होता है ।
डेंगू की चिकित्सा कैसे होती है ?
डेंगू की सहायात्मक चिकित्सा की जाती है । इस वायरस का कोई ईलाज नहीं है । नष्ट हुए प्लेटलेट की पूर्ति के लिए प्लेटलेट का ट्रान्सफ्यूजन, रक्त और बड़ी मात्रा में अन्तशिरा द्वारा द्रव दिया जाता है ।
मलेरिया और अन्य इन्फेक्शन की रोकथाम के लिए अतिरिक्त एंटीबायोटिक दिया जाता है । यह निवारणोपचार होता है और हमेशा इसकी आवश्यकता नहीं होती ।
कुछ वेबसाईट -
dengue symtoms & signs pathology labs mumbai india
साधारणतया हमारे शरीर की म्यूकस झिल्ली में रहने वाला एक प्रकार का यीस्ट है । जब शरीर की सामान्य परिस्थति बदलती है तो यह अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगता है । इससे एक प्रकार का इन्फेक्शन होता है जिसे मोनोलियासिस कहते हैं । इससे बच्चों के कूल्हों में डाइपर रैश, मुँह में छाले, योनि में इन्फेक्शन, शिश्न के चारों ओर, नाखून, गले में, आतों मेंइन्फेक्शन और हृदय में भी गंभीर इन्फेक्शन हो जाता है ।
यह कैसे होता है ?
यह इन्फेक्शन सामान्यतया चमड़ी में रहने वाले यीस्ट से होता है । सामान्य अवस्था में चमड़ी रहने वाले अन्य बैक्टिरिया, पी.एच., तापमान और नमी इसे बढ़ने नहीं देते । फिर भी इन घटकों के परिवर्तन होने पर जैसा एंटीबायोटिक का अति उपयोग, आधिक आर्द्रता, चमड़ी के दूसरे इन्फेक्शन अधिक रूखापन आदि होने पर इसका संतुलन बिगड़ जाता है और कैडिडा तेजी से बढ़कर इन्फेक्शन उल्लेखित जगहों में कर देता है ।
दुर्लभ रोगी में, जिनमें इम्यूनिटि की समस्या रहती है, जैसे एड्स, न्यूमोनिया, कैंसर इनमें यह इन्फेक्शन रक्त में प्रवेश कर जाता है और गला, आँतों और हृदय के वाल्व में फैल कर गंभीर उपद्रव उत्पन कर देता है ।
इसके प्रमुख लक्षण क्या हैं ?
*इससे शिशुओं के कूल्हों के चारो ओर और ऊरूमूल में लालिमा हो जाती है जिसे डाईपर रैश कहते हैं ।
*बच्चों और बड़ोंमें इम्यूनिटि की कम होने पर साधारणतया मुखगुहा में छाले हो जाते हैं इसे ओरल थ्रश कहते हैं । इससे जीभ और गाल का भीतरी भाग सफेद हो जाता है ।
*योनि प्रभावित होने पर इससे दूधिया बदबूदार रिसाव होता है ।
*पुरुषों में शिश्न प्रभावित होने पर इसके शीर्षस्थ भाग में सूजनव लाल हो जाता है ।
*दुर्लभ रूप में यह रक्त संचार द्वारा फैलता है तब गंभीर गले की खराश, आंतों का इन्फेक्शन होकर पतले दस्त, पेट फूलना और उदरशूल होता है । ऐसे रोगियों में इसोफेजियल कैडिड- यासिस इन्फेक्शन होना आम बात है । गंभीर ल्यूकिमिया, एड्स आद में हृदय के वाल्व तक इन्फेक्शन फैल कर कंजेस्टिव कार्डियक फेलयर या एरिथमिया हो सकते है ।
इसका निदान कैसे होता है?
यह चमड़ी और जननांगों का साधारण इन्फेक्शन है जिसे सामान्य परीक्षा द्वारा निदान किया जा सकता है और चिकित्सा की जा सकती है । फिर भी जिनमें निदान में संदेह हो तब ये टेस्ट की जाती है -
*कैडिड इम्यून कॉम्प्लेक्स एसे टेस्ट - यह विशेष रक्त परीक्षा है, जिससे यीस्ट के प्रति कार्यशील एंटीबायोटिक का पता चलता है ।
*पुरीष परीक्षा - आँतों में इन्फेक्शन होने पर मल परीक्षा द्वारा मल में कैन्डिडा का पता चलता है ।
*कैंडिडा कल्चर - मुख गुहा में छाले होने पर रूई द्वारा नमूना निकालकर कल्चर किया जाता है ।
इसकी चिकित्सा क्या है?
इन्फेक्शन के परिमाण पर चिकित्सा निर्भर होती है और अन्य इन्फेक्शन की उपस्थिति और इम्यूनिटि पर भी चिकित्सा निर्भर करती है । इन्फेक्शन की शुरुआत किन कारणों से हो रही है इसकी जॉंच क निवारण करना ही पूरी चिकित्सा हो सकती है ।
इसकी चिकित्सा में अक्सर स्थानीय उपयोग में एंटीफंगल दवा दी जाती है ।
गंभीर इन्फेक्शन में पूरी जॉंच जरूरी होती है । इससे उसके कारणों, सह उपस्थित रोग, आहार और इम्यूनिटि को बढ़ाने के उपाय शामिल होते हैं ।
अमेरिका की सबसे प्रचलित पुस्तक अब भारत में हेल्प पुस्तकालय में ५०% ४०० २०० की भारी छूट पर उपलब्ध है| अवश्य ख़रीदे !
मेरी पुस्तक!
घर का वैध पपीता भारत ने हमेशा अपने को प्रकृति के अस्तित्व के साथ जोड़कर देखा था प्रस्तुत छोटी पुस्तक में ऐसी ही घर घर में उपलब्ध व् श्ह्जता से उपलब्ध होनेवाली वस्तु जैसे "पपीता" के औषधीय गुणों और उसके प्रयोग से ठीक होनेवाली सैकड़ो रोगों के नुस्खो के बारे में बताया गया है| इस पुस्तक में पपीते के विषय में बारीक़ से बारीक़ जानकारी दी गयी है जैसे इसके जन्मस्थान से लेकर यह भारत में किस तरह से आया और इसका बिभिन्न बिभिन्न बीमारियों में इसका उपयोग किस तरह कर सकते है| लेखक :डॉ आर. एस अग्रवाल पृष्ठ:59